दक्षिण अफ्रीका में शिया और सुन्नी धर्मगुरुओं की उपस्थिती के साथ इस्लामी सेवा और दक्षिण अफ्रीका के इस्लामी केन्द्र के माध्यम से इस्लामी एकता पर सम्मेलन आयोजित किया गया. जिसका मकसद आपसी मतभेदों को बुलाकर मुसलमानों के बीच एकता पर जोर दिया गया .

इस्लामी एकता परिषद के महासिचव आयतुल्लाह अराकी ने सम्मेलन के उदघाटन के साथ ही कहा, इस्लामिक इतिहास में तमाम पैग़म्बरों का मकसद अल्लाह पर ईमान और उसके हुक्म की तामिल से पूरी इंसानियत को एक करने में रहा हैं. सभी पैग़म्बरों ने अल्लाह के समान इन्साफ के आधार पर एक समाज के निर्माण पर जोर दिया. उन्होंने आगे कहा, लेकिन अब शैतान धीरे धीरे इस्लामी समाज को नियंत्रित करते हुए इस्लामी समाज को बर्बाद कर रहा हैं. अराकी ने कहा, इस्लामी समाज पर अब्बासी, अमवी और दूसरी शैतानी ताक़तों की हुकूमत इन्हीं मतभेदों का कारण थी और आज भी साम्राज्यवादी शक्तियों का इस्लामी समाज पर कंट्रोल और आतंकवादी संगठनों का वजूद में लाना और तकफ़ीरी विचारधारा का प्रचार, इन्हीं मदभेतों का नतीजा हैं.

दक्षिण अफ़्रीका के वेईत्ज़ विश्वविद्यालय  के प्रोफेसर अब्दुल्लाह दियात ने एक़बाल लाहौरी की विचारधारा की तरफ़ इशारा करते हुए इस्लामी समाज में मतभेदों का कारण इस्लाम दुश्मन शक्तियों का प्रभाव माना और अल्लामा एक़बाल का शेर पढ़ते हुए उन्होंने इस्लामी समाज की दर्दों का दवा एकता को बताया. जोहानसबर्ग विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और नेसलन मंडेला का साथ क्रांति की लड़ाई लड़ने वाले प्रोफ़ेसर हारून अज़ीज़ ने इस्लामी समाज में पिछले 100 सालों में मतभेदों के पैदा होने के इतिहास को बयान करते हुए कहा कि इन मतभेदों के पीछे अमरीका और इंग्लैंड के हाथ हैं.

जोहानसबर्ग में अलमुस्तफ़ा विश्वविद्यालट के डीन हुज्जुल इस्लाम राद मुराद ने भी सृष्टि में अनेकता की बात कहते हुए संसार और इंसानी समाज में अनेकता को एक आवश्यक चीज़ बताते हुए कहा, यह अनेकताएं और मतभेद इंसानी समाज की तरक़्क़ी का कारण बनना चाहिए न कि टकराव का.

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