इस्राईल ने एक बार फिर से मस्जिदुल अक़सा की घेराबंदी शुरू कर दी है. जिसके तहत नमाज़ियों को मस्जिद में जाने से रोका जा रहा है.

फ़िलिस्तीन मामलों के विशेषज्ञ मुहम्मद जादुल्लाह का कहना है कि इस्राईल की इस कार्यवाही से स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया गया है कि मस्जिदुल अक़सा जैसी पवित्र इमारत अब फ़िलिस्तीनी प्रशासन के नियंत्रण में नहीं रही.

ज़ायोनी शासन की ओर से बैतुल मुक़द्दस के अतिग्रहण का यह षडयंत्र एेसी स्थिति में जारी है कि जब यूनेस्को ने लगभग डेढ साल पहले ही यह बात स्पष्ट कर दी थी कि मस्जिदुल अक़सा तथा अन्य पवित्र स्थलों का संबन्ध मुसलमानों से है यहूदियों से नहीं.

हालांकि इसके बावजूद मस्जिदुल अक़सा के विरुद्ध ज़ायोनी शासन के ख़तरनाक षडयंत्र लगातार जारी हैं.  इससे पहले से ज़ायोनी शासन ने यह घोषणा कर रखी है कि मुसलमान, यहूदियों के धार्मिक त्योहारों के अवसर पर मस्जिदुल अक़सा में नहीं जा सकते.

मस्जिदुल अक़सा में नमाज़ियों को जाने से रोककर ज़ायोनी शासन, फ़िलिस्तीनियों के धार्मिक अधिकारों के हनन के साथ अन्तर्राष्ट्रीय नियमों का भी हनन कर रहा है.  ज़ायोनी शासन और जार्डन के बीच सन 1994 में होने वाले समझौते के आधार पर यह तय पा चुका है कि मस्जिदुल अक़सा के प्रांगण में भी ज़ायोनी उपासना नहीं करेंगे.

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