ईरान के प्रमुख अधिकारियों ने सीरिया में फ़ौजें भेजने की सऊदी अरब की पेशकश पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है.

कुछ दिनों पहले सऊदी अरब रक्षा मंत्रालय के ब्रिगेडियर जनरल अहमद बिन हसन अल-असीरी ने ऐलान किया कि उनका देश ”सीरिया में किसी भी ज़मीनी फ़ौजी कार्रवाई में हिस्सा लेने के लिए तैयार है.”

यह ख़बर सऊदी पैसे से चलने वाले अल-अरबिया टीवी में चार फ़रवरी को आई थी.


अल-जज़ीरा की वेबसाइट पर छह फ़रवरी को अल-असीरी के हवाले से कहा गया, “हम जानते हैं कि हवाई हमले काफ़ी नहीं हैं और ज़मीन पर कार्रवाई की ज़रूरत है. हमें बेहतर नतीजों के लिए दोनों को एक करना चाहिए.”

तसनीम समाचार एजेंसी ने छह फ़रवरी को ख़बर दी कि सऊदी घोषणा पर ईरान की ताक़तवर फ़ौजी संस्था इस्लामिक रिवॉल्यूशन गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) के कमांडर इन चीफ़ मोहम्मद अल-जाफ़री ने कहा कि सऊदी अरब के पास उतनी तकनीकी क्षमता और साहस नहीं है कि वह सीरिया में फ़ौजें भेज सकें क्योंकि उनके सैन्य बलों का ‘ढांचा पारंपरिक’ है.


जाफ़री ने आगे कहा कि अगर सऊदी अफ़सर सीरिया में फ़ौजें भेजते हैं तो वो ”ख़ुद को गंभीर चोट पहुँचाएंगे.”

आईजीआरसी के एक अन्य कमांडर होसैन सलामी ने कहा कि सऊदी अरब का यह प्रस्ताव ”एक सियासी मज़ाक़ लगता है.”

ईरान के चैनल टू पर छह फ़रवरी को ही उन कमांडर ने कहा, “सऊदी अरब का मुस्लिम देशों में अपनी नीतियों, रणनीतियों, वित्तीय मदद और उकसावे के ज़रिए अराजकता का लंबा इतिहास है. मगर सैन्य ढंग से देखें तो इसमें किसी जंग का रुख़ बदलने की ताक़त नहीं है.”

यह बात उन्होंने सऊदी फ़ौजों के सीरिया में संभावित हस्तक्षेप को लेकर उठे सवालों पर कही.

इस बीच ईरान की एक प्रशासनिक संस्था एक्पीडीएंसी काउंसिल के प्रवक्ता और आईआरजीसी के पूर्व कमांडर इन चीफ़ ने चेतावनी दी कि सीरियाई संघर्ष में शामिल होने से ”इलाक़े में बड़ा युद्ध छिड़ सकता है.”

ईरान, रूस और लेबनान के हिजबुल्लाह संगठन विद्रोहियों से लड़ाई में सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद सरकार को समर्थन देते रहे हैं.

हाल में सीरियाई सरकारी फ़ौजों ने रूसी हवाई हमलों की मदद से नब्ल और एलैपो में अहम जीत हासिल की हैं.

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