इस हफ्ते के मध्य में रोहिंग्याओं की म्यांमार वापसी शुरू होने वाली है। लेकिन वापस म्यांमार भेजे जाने से बचने के लिए बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों से भाग रहे हैं। समुदाय के नेताओं ने सोमवार को यह जानकारी दी।

समुदाय के नेताओं के मुताबिक इस संभावना ने शिविरों में रह रहे लोगों को आतंकित कर दिया और कुछ ऐसे परिवार ,जिन्हें सबसे पहले वापस भेजा जाना था , वहां से फरार हो गए। जामतोली शरणार्थी शिविर के नूर इस्लाम ने कहा, ‘‘अधिकारी शरणार्थियों को लगातार वापस जाने के लिए प्रेरित करने का प्रयास कर रहे हैं। पर इसके उलट वह भयभीत होकर दूसरे शिविरों में भाग रहे हैं।’’

योजना के तहत बृहस्पतिवार से करीब 2,260 रोहिंग्या मुसलमानों को दक्षिणपूर्वी कॉक्स बाजार जिले की सीमा से स्वदेश वापस भेजा जाना है। वहीं दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष शरणार्थी अधिकारी ने कहा है कि विस्थापित रोहिंग्या शरणार्थियों की म्यामां वापसी केवल उनकी ‘स्वतंत्र रूप से व्यक्त की गयी इच्छा’ पर होनी चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) फिलिप्पो ग्रेंडी ने रविवार को एक बयान में कहा कि शरणार्थियों की वापसी उनके स्वतंत्र फैसले पर आधारित होनी चाहिए। वहीं अमेरिका ने भी बांग्लादेश से रोहिंग्या शरणार्थियों की म्यामांर में स्वैच्छिक और सम्मानजनक वापसी की मांग करते हुए कहा कि ढाका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें तमाम गतिविधियों की स्वतंत्रता हो और वे ‘शिविरों तक ही सीमित ना रहें।’

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अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने रविवार को एक बयान में कहा कि हमने दोनों सरकारों के उच्च स्तर के अधिकारियों को समय से पहले वापसी को लेकर अपनी गंभीर चिंताओं से अवगत करा दिया है।

इस बात पर जोर दिया गया कि अंतरराष्ट्रीय परिपाटी के अनुरूप स्वैच्छिक, सुरक्षित, और सम्मानित तरीके से वापसी हो। इसके अलावा म्यामां वापसी के बाद उन्हें तमाम गतिविधियों की आजादी हो और वे शिविरों तक ही सीमित ना रहें। साथ ही, विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र में शरणार्थियों के उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) के उस आकलन से भी सहमत है, जिसमें कहा गया है कि रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी के लिए म्यामां में स्थिति अभी पूरी तरह अनुकूल नहीं है।

बता दें कि म्यामांर के मुस्लिम अल्पसंख्यक रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ अगस्त 2017 के बाद से हिंसा शुरू हो गयी थी जिसके बाद हजारों लोगों को रखाइन प्रांत में अपने घर छोड़कर बांग्लादेश में शरण लेनी पड़ी।

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