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चीन की वामपंथी सरकार सिर्फ मुस्लिम समुदाय पर ही नहीं बल्कि ईसाई समुदाय पर भी धार्मिक पाबंदी लगा रही है। ऐसे में सभी धर्मों को चीनी हिसाब से ढालने और विकास परियोजनाओं के नाम पर प्राचीन इलाकों को ढहाया जा रहा है। ऐसे में चीन के हेनान प्रांत में रहने वाले रोमन कैथोलिक समुदाय के पास प्रार्थना करने के लिए कोई जगह नहीं बची है।

मध्य चीन में कैथोलिक चर्च के बाहर लगे एक सरकारी साइन बोर्ड पर बच्चों को प्रार्थना में नहीं शामिल होने की चेतावनी दी गई है। साथ ही “अवैध” चर्च गिराए जा रहे हैं। चर्च के शीर्ष पर से क्रॉस हटा लिए गए हैं, धार्मिक सामग्रियों और पवित्र चीजों को जब्त कर लिया गया है और चर्च द्वारा चलाए जाने वाले केजी स्कूलों को बंद कर दिया गया है।

चर्च से राष्ट्रीय झंडा फहराने और संविधान को प्रदर्शित करने को कहा गया है जबकि सार्वजनिक स्थानों से धार्मिक प्रतिमाओं को हटाने को कहा गया है। 2010 में प्यू सेंटर के एक रिसर्च के मुताबिक, चीन की कुल जनसंख्या का 5 प्रतिशत आबादी ईसाई धर्म को मानती है।

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चीन में ईसाइयों के लिए यह माहौल नया नहीं है। सन् 1951 में वेटिकन और पेइचिंग के आपसी संबंध कटु के सबंध के बाद चीन के करीब 1 करोड़ 20 लाख कैथोलिक दो समूहों में बंट गए हैं। एक समूह जो सरकार द्वारा मंजूर धर्माधिकारी को मानता है और दूसरा वह जो रोम समर्थक चर्च के स्वीकृत नियमों को मानता है। लेकिन अब वेटिकन और पेइचिंग के आपसी संबंध सुधार आया है।

‘द गार्जियन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, हूझो में चीनी प्रशासन ने ईसाईयों के लगातार विरोध प्रदर्शन के बावजूद एक चर्च से क्रॉस हटवा दिया। 2013 से 2015 के बीच ‘सुरक्षा और सुंदरता’ के नाम पर चीन में 1200 क्रॉस हटाए गए।

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