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भारत की राजनीति में भूचाल लाने वाले राफेल डील विवाद को लेकर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने कहा है कि यह दो देशों के बीच हुआ सौदा है और इसे लेकर वह कड़े नियमों का पालन करते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जब दोनों देशों के बीच 36 विमानों के सौदे पर हस्ताक्षर हुए थे, तब वह सत्ता में नहीं थे।

संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान पत्रकार इमैनुअल मैक्रों के साथ बातचीत में एक भारतीय न्यूज चैनल के पत्रकार ने इमैनुअल मैक्रों से सीधे इस संबंध में सवाल पूछा कि पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद द्वारा दावा किया गया है कि भारत सरकार ने अनिल अंबानी के रिलायंस डिफेंस को भारत के साथी के रूप में लेने के लिए फ्रांसीसी सरकार या राफेल के निर्माता दासॉल्ट को नाम का प्रस्ताव दिया था ।’

इमैनुअल मैक्रों ने अपनी प्रतिक्रिया में सीधे आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि बात का दो टूक जवाब देते हुए कहा कि मैं उस समय सत्ता में नहीं था। इमेनुअल मैक्रों ने कहा कि मैं पूरी तरह स्पष्ट करना चाहूंगा कि यह दोनों सरकारों के बीच की बातचीत है। मैं इसके लिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात का हवाला दूंगा, जो उन्होंने कुछ दिन पहले कही थी।

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बता दें कि भारत ने सितंबर 2016 में फ्रांस सरकार से 58 हजार करोड़ रुपए में 36 राफेल फाइटर विमानों की डील की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी घोषणा 2015 के अपने पेरिस दौरे के करीब डेढ़ साल बाद की थी। उम्मीद है कि सितंबर 2019 इन विमानों की डिलीवरी शुरू हो जाएगी।

इस डील को लेकर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के हवाले से एक बयान प्रकाशित किया गया है। जिसमें कहा गया कि 58,000 करोड़ रुपये के राफेल जेट विमान सौदे में भारत सरकार ने रिलायंस डिफेंस को दसॉ एविएशन का साझेदार बनाने का प्रस्ताव दिया था। रिपोर्ट में कहा गया कि ऐसे में फ्रांस के पास कोई विकल्प नहीं था।

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