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शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में फिलिस्तीन की जमीन पर अवैध बस्ती के निर्माण के खिलाफ प्रस्ताव पारित हुआ. इस प्रस्ताव के दौरान ख़ास बात ये रही कि हमेशा से साथ देने वाला अमेरिका भी इस्राइल के साथ खड़ा नजर नहीं आया. इस प्रस्ताव को पारित कर इस्राइल की निंदा की गई.

दरअसल इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस प्रस्ताव को रोकने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा पर काफी दबाव डाला. इसमें उनका साथ राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भी दिया. इसके विपरीत ओबामा प्रशासन ने इस प्रस्ताव पर वीटो करने के बजाय खुद को इसे अलग कर लिया.

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शुक्रवार को सुरक्षा परिषद ने इस प्रस्ताव को 14 मतों से मंजूर कर लिया. जिसमे इस्राइली बस्तियों के फैलाव को लेकर उसकी निंदा की गई. अमेरिका इस दौरान वोटिंग से गायब रहा. याद रहें कि अगर अमेरिका अपने वीटो अधिकार का इस्तेमाल करता, तो यह प्रस्ताव खारिज हो जाता.

UN में इस्राइल के राजदूत डेनी डेनन ने इस वोटिंग के बाद नाराजगी दिखाते हुए कहा कि उम्मीद की जानी चाहिए थी कि इस्राइल का सबसे बड़ा सहयोगी देश हमारे साझा मूल्यों के मुताबिक बर्ताव करेगा. इस शर्मनाक प्रस्ताव के खिलाफ अमेरिका वीटो करेगा, इसी बात की उम्मीद की जानी चाहिए थी. जहां तक संयुक्त राष्ट्रसंघ के साथ इस्राइल के संबंधों की बात है, तो मुझे कोई शक नहीं है कि नए अमेरिकी राष्ट्रपति का प्रशासन और UN के नए महासचिव इससे अलग साबित होंगे.’

वहीँ UN में अमेरिका की राजदूत समांथा पावर ने कहा कि इस्राइली बस्तियों के विस्तार का विरोध करना रीगन के बाद से लेकर अबतक के सभी अमेरिकी राष्ट्रपतियों की नीति रही है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति चाहे रिपब्लिकन हों या फिर डेमोक्रैटिक, दोनों ने ही इसी नीति का पालन किया है.

दूसरी तरफ फिलिस्तीन के एक नेता ने कहा, ‘यह हमारे लोगों और हमारे मकसद की जीत है. इस्राइली बस्तियों पर प्रतिबंध लगाने की हमारी मांगों के लिए यह वोटिंग नया दरवाजा खोलेगी.’ फिलिस्तीन के लिए आने वाला वक्त हालांकि इतना आसान होता नहीं दिख रहा है.

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