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ज़ैग़म मुर्तज़ा

संयुक्त राष्ट्र में हमास के मुद्दे पर अमेरिकी प्रस्ताव का गिरना कई संकेत देता है। हालांकि ये पहली बार नहीं है जब इज़रायल और अमेरिका को फलीस्तीन के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में शर्मिंदा होना पड़ा है। अमेरिकी प्रस्ताव के विरोध में 87 के मुक़ाबले 57 वोट और 33 देशों का अनुपस्थित होना बताता है कि दुनिया अमेरिका के प्रभाव से बाहर निकलने को बेताब है। हालांकि प्रस्ताव के पक्ष में ज़्यादा वोट पड़े लेकिन अमेरिका दो तिहाई सदस्यों का समर्थन पाने में नाकाम रहा। हालांकि अमेरिका ख़ुश हो सकता है कि पहली बार 87 देशों ने हमास के ख़िलाफ वोट किया लेकिन ये बात अब छिपी नहीं है कि इज़रायल या अमेरिका को इस तरह के प्रस्ताव लाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

दरअसल अमेरिका की इज़रायल के साथ दोस्ती किसी से छिपी नहीं है। अमेरिका इज़रायल के बुरे से बुरे काम में भी साथ रहा है। फिर चाहे मामला फलीस्तीन के बेगुनाह शहरियों पर गोलीबारी का हो या फिर पड़ोसी देशों में ग़ैरक़ानूनी दख़लअंदाज़ी का। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका हमेशा ही इज़रायल के ख़िलाफ आए प्रस्तावों पर वीटो करता रहा है। हालांकि 2013 तक ही संयुक्त राष्ट्र में इज़रायल के ख़िलाफ 45 बार निंदा प्रस्ताव पारित हो चुके हैं।

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संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिका, सऊदी अरब, जॉर्डन, मिस्र, बहरीन और यूएई जैसे सहयोगियों को हमास की निंदा करने वाले इस प्रस्ताव पर वोटिंग के लिए नहीं मना पाया। इससे ट्रंप प्रशासन की अरब-अमेरिका रिश्तों को इज़रायल के क़रीब ले जाने की कोशिशों को भी धक्का लगा है। अमेरिका को उम्मीद थी कि इज़रायल से बेहतर होते रिश्तों के मद्देनज़र कम से कम सऊदी अरब इस प्रस्ताव का समर्थन करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र में इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहु के अमेरिका के प्रयासों पर आभार जताया है। लेकिन इज़रायल इस प्रस्ताव के पारित न हो पाने से दुखी है। इज़रायली अख़बार हारेत्ज़ ने इसे अमेरिकी प्रशासन की बड़ी विफलता बताया है। हारेत्ज़ ने माना है कि फलीस्तीनी प्राधिकरण ने इस प्रस्ताव का मज़बूत मुक़ाबला किया और ये चिंता की बात है। इधर हमास की राजनीतिक शाखा के प्रमुख इस्माइल हानिया ने इसे फलीस्तीनी जनता की जीत बताया है। हानिया के मुतबिक़ ये फलीस्तीनी प्राधिकरण की कोशिशें बताती हैं कि संकट के समय सभी फलीस्तीनी एकजुट हैं।

दरअसल ग़ज़ा में सोमवार को एक बार फिर हिंसा भड़क उठी। इसकी वजह इज़रायल गुप्तचर सेवा की कार्रवाई है जिसमें हमास का एक कमांडर शहीद हो गया। इसके बाक गज़ा से इज़रायल पर 460 रॉकेट दाग़े गए। इन हमलों में पश्चिमी तट इलाक़े में एक इज़रायली मज़दूर मारा गया। जवाब में इज़रायली विमानों ने गज़ा में 160 से ज़्यादा हवाई हमले किए हैं। अमेरिका इज़रायल के हमलों पर हमेशा की तरह ख़ामोश है।

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