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ज़ैग़म मुर्तज़ा

1997 में ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की फिल्म चिल्ड्रेन ऑफ़ हैवेन आई। इस फिल्म को दक्षिण तेहरान की पृष्ठभूमि में फिल्माया गया। दक्षिण तेहरान और शहर के सबअर्बन इलाक़े ग़रीब, मज़दूर और मेहनतकश लोगों की पहचान थे। उस फिल्म मे पुराने ज़माने के मेहराबदार घर और तंग गलियां नज़र आते हैं। हालांकि भारत जैसे स्लम्स या मलिन बस्ती जैसे वो भी नहीं थे। तब से ईरान कितना बदला है?

teh1उत्तरी तेहरान अभी भी सत्ता और कारोबार से जुड़े कुलीन वर्ग का ठिकाना है। भारत में हैदराबाद के जुबली हिल, मुंबई का जुहू और दिल्ली के पृथ्वीराज रोड जैसे इलाक़े भी इससे मुक़ाबला नहीं कर पाते। न सिर्फ घर, बाज़ार, गलियां और नगरीय सुविधाएं व्यवस्थित हैं बल्कि साफ सफाई और अतिक्रमण मुक्त होने के मामले में ये शहर लंदन और पेरिस के स्तर का है। यहां तमाम निर्माण एक सीध में हैं यानि न किसी की सीढ़ी-पैड़ी बाहर निकली है और न किसी का गेट या छज्जा। सड़क के किनारे पहले ड्रेनेज, फिर ग्रीन बेल्ट फिर फुटपाथ और फिर निर्माण होता है। शहर में व्यवस्थित चौराहे, साफ सुथरे पार्क और व्यवस्थित पार्किंग स्पेस हैं। तेहरान हाईवे और टनल्स का शहर है। कई जगह तीन मंज़िला पुल हैं और उसके ठीक नीचे से टनल यानि सुरंग भी हो सकती है। कहा जाता है कि एक तिहाई तेहरान ज़मीन के नीचे है, एक तिहाई ज़मीन पर और बाक़ी पहाड़ियों पर।

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उत्तरी तेहरान में आबादी का घनत्व कम करने और उसे दक्षिणी तेहरान जैसा बनाने के लिए तमाम तरह के क़दम उठाए गए हैं। ये किसी भी नगर निगम, शहरी विकास ऐजेंसी या सरकार के लिए नमूना हो सकते हैं। सरकार ने यहां से धीरे-धीरे लोगों को दूसरी जगह ले जाकर बसाया है। यहां सरकार पहले लोगों को विकल्प बताती है, फिर पुराने घर और नए घर की क़ीमत बताती है। ज़रूरत पड़ने पर विस्थापित को ब्याज़मुक्त लोन दिया जाता है। पुराने घर की क़ीमत ज़्यादा है तो बक़ाया का भुगतान कर दिया जाता है। इस नीति के ज़रिए तेहरान में रौज़ा सैयद ज़ादेह के अलावा मशहद और क़ुम के पर्यटन स्थलों पर भीड़ और निर्माण घनत्व कम किया गया है। राजधानी तेहरान समेत किसी भी शहर में स्लम्स नहीं दिखते क्योंकि ईरान में ज़मीन की कोई कमी नहीं है और घर बनाना आसान है। निर्माण में ईरानी वास्तुकला के अलावा आधुनिक शैली भी चलन में है। घर की ख़ाली बाहरी दीवार पर इंक़लाब से जुड़े चित्र या शहीदों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें बनवाने का चलन है। आमतौर पर थोड़े से फासले पर एक शानदार मस्जिद दिख जाती है। इसके अलावा शहरों में चर्च, यहूदी इबादतगाह और दूसरे मज़हबों के पूजा स्थल भी मिल जाते हैं।

teh4शहरो में ट्रांसपोर्ट व्यवस्था बेहतरीन है। दिल्ली में बीआरटी विफल रहा है लेकिन तेहरान में न सिर्फ सफल है बल्कि लाखों लोग इससे फायदा उठा रहे हैं। तमाम शहरो में सार्वजनिक बसों के अलावा मेट्रो और रेल नेटवर्क ठीकठाक है। हालांकि दफ्तर के टाईम पर ट्रेफिक बढ़ जाता है लेकिन भारत जैसे जाम यहां नहीं लगते। लोग अपनी लेन में चलते हैं और एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ नहीं करते। ईरानी व्यवहारिक तौर पर सफाई पसंद हैं इसलिए सरकार को स्वच्छता अभियान नहीं चलाने पड़ते। सड़के और गलियां बेहद साफ हैं। लोग पड़ोसी के दरवाज़े पर अपने घर का कचरा नहीं फेंकते।

ईरान में बिजली, तेल और रोटी बेहद सस्ते हैं। पेट्रोल औसतन दस रुपये लीटर है। बिजली, पानी का बिल न के बराबर आता है। आटा सरकार सब्सिडी पर देती है और रोटियां घर में नहीं पकाई जातीं। अपनी औरतों को चूल्हे के सामने बैठाना ईरानी अच्छा नहीं समझते। रोटी बेकरी से आती है और सब्ज़ी घर में पकाई जाती है। सस्ता ब्रेड और रोटी मुहैया कराना सरकार की ज़िम्मेदारी है।

teh7अब बात अंतरर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों की। इनका असर सड़कों पर दिखता है। ईरान में अरब देशों की तरह बड़ी बड़ी विदेशी कारें नहीं दिखतीं। बाज़ारों में मेड इन ईरान सामान की भरमार है। हालांकि चीनी, कोरियाई,जर्मन और यूरोपीय उत्पाद भी दिख जाते हैं। ये बीच में कुछ समय के लिए प्रतिबंधों मे मिली छूट की वजह से भी हो सकता है। ईरानी कार हमारी मारूती के पुराने माॅडल सी दिखती हैं। हालांकि कुछ लोग छूट के दौरान मंहगी कार आयात करने में सफल रहे हैं। फिर भी ईरानियों में विदेशी सामान के लिए होड़ या भौतिकतावाद कम ही दिखता है। स्वभाव से ईरानी कलाप्रेमी हैं। ये उनके घर में और जीवन में नज़र आता है। इन दिनों मौसम में गर्मी के बावजूद पसीना नहीं आता है।

तेहरान ईरान का सबसे प्रदूषित शहर है मगर फिर भी सफेद शर्ट का काॅलर काला नहीं होता है। लोग मिलनसार हैं और हिंदुस्तानी फिल्मों के दीवाने हैं। अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान और सलमान ख़ान के अलावा गांधी वहां सबसे लोकप्रिय भारतीय हैं। गांधीजी की वजह से ईरान में भारतीयों का सम्मान है। शायद इसीलिए तेहरान के मध्य में एक प्रमुख सड़क का नाम गांधी स्ट्रीट है।

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