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बैरूत, 13 मार्च। लेबनान की राजधानी बैरूत के दक्षिणी अलजिया क्षेत्र में चल रहे चौथे अन्तरराष्ट्रीय फ़िलस्तीन अधिवेशन में भारत का बहुत बड़ा प्रतिनिधिमंडल आया है। आमतौर पर मेज़बान लेबनान और फ़िलस्तीन को छोड़ दें तो शायद भारत का ही सबसे बड़ा दल है। यहाँ भारत के फ़िलस्तीन के प्रति समर्थन और सहयोग को लेकर बहुत सम्मान है। पहले दिन जहाँ भारत से आए प्रतिनिधिमंडल में छात्र नेता और मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइज़ेशन के अध्यक्ष शुजात क़ादरी को फ़िलस्तीन के पक्ष में भारत में गतिविधियों के लिए सम्मानित किया गया, वहीं दूसरी तरफ़ मशहूर गाँधीवादी नेता तुषार गाँधी और पूर्व मंत्री मणिशंकर अय्यर समेत फ़िलस्तीन सबब के लिए कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता फिरोज़ मीठीबोरवाला, तंज़ीम उलामा ए इस्लाम के संस्थापक अध्यक्ष मुफ़्ती अशफ़ाक़ हुसैन क़ादरी और बंगलौर में सामाजिक कार्यकर्ता सैयद बाक़िर ने भी शिरकत की।

हमने भारत के फ़िलस्तीन के मुद्दे पर प्रतिभागियों की राय जानने की कोशिश की जिसमें भारतीय प्रतिनिधिमंडल से प्रमुखता से सवाल पूछे गए।

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मणिशंकर अय्यर

फ़िलस्तीनियों की हो घर वापसी- मणिशंकर अय्यर

भारत से आए प्रतिनिधि और पूर्व केन्द्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कहाकि फ़िलस्तीनियों को अपना देश वापस मिलना चाहिए। फ़िलस्तीन के मुद्दे पर जो भी बाहरी लोग हैं, उन्हें साथ मिलकर बैठना चाहिए और यह तय करना चाहिए कि बाहर रह रहे सभी फ़िलस्तीनी अपने घर वापस लौट पाएं। उन्होंने महात्मा गाँधी के मशहूर वाक्य को दोहराते हुए कहाकि जैसे इंग्लैंड अंग्रेज़ों का और फ्रांस फ्रेंच लोगों का घर है, उसी तरह फ़िलस्तीन फ़िलस्तीनियों का है। भारत का इस आंदोलन के साथ नहीं जुड़ना महात्मा के विचारों के विरुद्ध होगा। अय्यर ने ज़ोर देते हुए कहाकि गांधीजी के ज़माने में यह परिस्थितियाँ नहीं थीं जो आज हैं इसलिए मैं यहाँ आया हूँ। उन्होंने लेबनान में भारत की इस्राइल नीति पर टिप्पणी करने से मना कर दिया और कहाकि इस बारे में उनके भारत सरकार से मतभेद हैं जिस पर वह अवसर मिलने पर अपने विचारों को व्यक्त करेंगे।

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मुफ़्ती अशफ़ाक़ हुसैन क़ादरी

फ़िलस्तीन का मुद्दा भारत का मुद्दा है- मुफ़्ती अशफ़ाक़ हुसैन क़ादरी

भारत में सूफ़ी उलेमा और आम जनता का सबसे बड़ा संगठन चला रहे सूफ़ी नेता मुफ़्ती अशफ़ाक़ हुसैन क़ादरी ने कहाकि फ़िलस्तीन की आज़ादी का मतलब यह क़तई नहीं है कि इस्राइल नाम को कोई देश शेष रहेगा। यह पूरा फ़िलस्तीन है और फ़िलस्तीनियों को मिलना चाहिए। उन्होंने कहाकि इस्राइली ज़ुल्म के आगे फ़िलस्तीन कभी नहीं झुकेगा और भारत अपने वादे पर अडिग है कि वह फ़िलस्तीनियों की वतन में वापसी और 1948 में इस देश पर ज़ायोनिस्ट क़ब्ज़े से पूर्व देश उन्हें मिलना चाहिए। क़ादरी ने कहाकि उनके संगठन ने भारत में कई बार इस्राइली ज़ुल्म के विरुद्ध और फ़िलस्तीनियों के समर्थन में रैलियाँ, मार्च और सम्मेलन किए हैं। हमारे संगठन में 10 लाख सदस्य हैं जो ज़ाहिर हैं मुसलमान हैं। तब भी इसके अलावा भारत का हर धर्म, वर्ग और सम्प्रदाय का व्यक्ति फ़िलस्तीन के प्रति अपने समर्थन को लेकर अडिग है।

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शुजात क़ादरी

छात्रों के बीच फ़िलस्तीन की जानकारी बढ़ रही है- शुजात क़ादरी

भारत में मुस्लिम छात्रों के सबसे बड़े संगठन मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इंडिया के  शुजात अली क़ादरी ने कहाकि बैरूत में फ़िलस्तीन वापसी के वैश्विक आंदोलन में यह उनकी चौथी शिरकत है। वह इस बात के समर्थक रहे हैं कि जिस नक़्शे को इस्राइल का बताकर प्रचारित किया जाता है, वह पूरा फ़िलस्तीन है। उन्होंने कहाकि उनके संगठन ने पूरे देश में फ़िलस्तीन के मुद्दे पर बहुत कार्यक्रम किए हैं जिसमें फ़िलस्तीनियों पर इस्राइली ज़ुल्म, जेलों में मानवाधिकार उल्लंघन, इस्राइली सेना के हाथों बच्चों और महिलाओं को निर्मम हत्या, फ़िलस्तीनी बस्तियों पर क़ब्ज़े, मस्जिद अलअक़्सा पर ज़ायोनिस्ट हमले समेत सभी मुद्दों पर छात्रों की जानकारी में इज़ाफ़ा हो रहा है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वह फ़िलस्तीन पर अपनी राय को शोध के आधार पर तय करें। शुजात क़ादरी को भारत में फ़िलस्तीन से जुड़ी गतिविधियों को प्रखरता देने के लिए फ़िलस्तीन वापसी के वैश्विक आंदोलन में सम्मानित भी किया गया।

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फ़िरोज़ मीठीबोरवाला

संकट से गुज़र रहा है फ़िलस्तीन आंदोलन- फ़िरोज़ मीठीबोरवाला

मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता फ़िरोज़ मीठीबोरवाला ने कहाकि यह फ़िलस्तीन के लिए संकट का दौर है। जब से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यरूशलम को इस्राइल की राजधानी स्वीकार करते हुए अपने देश के दूतावास को तेल अवीव से यरूशलम लाने की घोषणा की है, यह फ़िलस्तीन के लिए मुश्किल का दौर है। उन्होंने कहाकि यह क्षेत्र अभी बहुत बंटा हुआ है और अरब के देश इस्राइल के साथ मिलकर लगातार फ़िलस्तीन के साथ धोखा कर रहे हैं। लेकिन इन देशों को समझना चाहिए कि आम अरब और जनता में फ़िलस्तीन के लिए समर्थन बढ़ भी रहा है। यह भूराजनीतिक संतुलन ही तय करेगा कि फ़िलस्तीन का भविष्य क्या है। अमेरिका में ब्लैक फॉर पेलेस्टाइन, दक्षिण अमेरिका में चे ग्वेरा के समर्थन में आंदोलन, अफ्रीका में मंडेला के समर्थन में आंदोलन के बीच फ़िलस्तीन वापसी के वैश्विक आंदोलन में मशहूर गाँधीवादी नेता तुषार गाँधी की शिरकत फ़िलस्तीन के आंदोलन को प्रखरता देगा। 

उन्होंने कहाकि इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू की यात्रा और हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस्राइल के प्रति नरमी के बावजूद भारत की जनता फ़िलस्तीन के साथ है। उन्होंने कहाकि भारत सभी फ़िलस्तीनी मुद्दों यानी मस्जिद अल अक़्सा, क़ुब्बत अल सखरा (डोम ऑफ़ रॉक) और पवित्र चर्च (Church of the Holy Sepulchre) को ज़ायोनी हमले से बचाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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सम्मेलन के तीसरे दिन ग़ज़ा पट्टी और मानवाधिकार के मुद्दों और फ़िलस्तीन के लिए वैश्विक समर्थन पर चर्चा होगी। बैरूत में फ़िलस्तीन के अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन में क़रीब 70 देशों के 350 से अधिक फ़िलस्तीन सबब के कार्यकर्ता और समर्थक भाग ले रहे हैं।

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