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25 अगस्त 2017 के बाद म्यांमार के राखिने से अपनी जान बचाकर बांग्लादेश पहुंचे रोहिंग्या मुस्लिमों के हालत दयनीय होते जा रहे है.  विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्रीय निदेशक डॉ. पूनम खेत्रपाल के अनुसार रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में 60,000 बच्चों के जन्म लेने का अनुमान है.

डॉ. पूनम ने कहा, “25 अगस्त, 2017 से शुरू हुआ यह संकट अब अपने चरम पर पहुंच गया है.  बांग्लादेश के कॉक्स बाजार के शरणार्थी शिविरों में 6,88,000 रोहिंग्या रह रहे हैं, जबकि इससे पहले यहां 2,12,500 रोहिंग्या बांग्लादेश पहुंच चुके हैं. ये सभी कुपोषण के साथ मानसिक बीमारियों से जूझ रहे हैं, जिनमें सर्वाधिक दयनीय स्थिति बच्चों की है.

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उन्होंने बताया, “रोहिंग्या शरणार्थियों की सबसे बड़ी आबादी काटुपालोंग और बालुखली शिविरों में दयनीय हालत में रह रही है, लेकिन सबसे बड़ा खतरा इनके स्वास्थ्य को लेकर है, इसलिए इनके स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करने की जरूरत है. महिलाओं और कम उम्र की मांओं को प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने की जरूरत है. डॉ. पूनम ने कहा, सबसे बड़ी चिंता मानसून सीजन को लेकर है. जल्द ही बारिश शुरू होने वाली है. ऐसे में इन लोगों में हैजा, हेपेटाइटिस, मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ेगा. हालांकि उन्होंने ये भी बताया कि “डब्ल्यूएचओ बांग्लादेश के स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर कॉक्स बाजार में रोहिंग्या मुसलमानों की इस बड़ी आबादी को स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करा रही है.

उन्होंने कहा, डब्ल्यूएचओ ने कई तरह के टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किए हैं.हमने हैजे को लेकर अक्टूबर और नवंबर 2017 में दो चरणों में व्यापक अभियान शुरू किया, जिसके तहत हैजा की 900,000 खुराकें पिलाई गईं. इसके साथ ही सितंबर और नवंबर में खसरे और रूबेला टीकाकरण का अभियान शुरू हुआ, जिसमें 15 साल तक की उम्र के 3,35,000 बच्चों का टीकाकरण किया गया. इसके साथ ही पोलियो और न्यूमोनियो के टीके लगाए गए। डिप्थीरिया के भी दो टीकाकरण अभियान शुरू किए गए/ पहले दौर के तहत लगभग 500,000 बच्चों का टीकाकरण हुआ। दूसरे चरण के तहत लगभग 3,98,000 बच्चों का टीकाकरण किया गया. मार्च में डिप्थीरिया के टीकाकरण का तीसरा दौर शुरू करने की योजना है.”

उन्होंने कहा, प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए स्वास्थ्य योजनाओं का खाका तैयार हो रहा है. दूषित पानी की जांच के लिए लैब की स्थापना की गई है. ट्यूबवेल एवं घरेलू कंटेनरों में जल की गुणवत्ता की जांच के लिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है. डब्ल्यूएचओ ने किसी भी तरह की बीमारी का पता लगाने के लिए अर्ली वार्निग एंड रिस्पांस प्रणाली स्थापित की है. डॉ. पूनम खेत्रपाल ने कहा, “हम काम कर रहे हैं, लेकिन बेहतर होगा कि शरणार्थियों के भविष्य पर गंभीरता से फैसला लिया जाए.”

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