जर्मनी की विदेशी संबंध परिषद के एक विशेषज्ञ ने अमेरिका की ओर से परमाणु करार का रद्द करना अमेरिका की विश्वसनीयता मे कमी आने का उल्लेख करते हुए कहा कि अन्य हस्ताक्षरकर्ताओ ने स्पष्ट रूप से संयुक्त वक्तव्य जारी करके समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है।

ईरान के खिलाफ ट्रम्प के हालिया बयान विशेषकर परमाणु समझौता ऐसा विषय बन गया है जिसके विश्लेषण और व्याख्या की चर्चा अंतरराष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से हो रही है।

ट्रम्प के ईरान विरोधी भाषण की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई है। ट्रम्प ने ईरान द्वारा परमाणु करार की प्रतिबद्धता का समर्थन नही किया है बल्कि ट्रम्प ने तेहरान के खिलाफ नए प्रतिबंध लगाने को कांग्रेस के हवाले कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के प्रति नए दृष्टिकोण के बारे मे भी बात की है।

इसी संदर्भ मे जर्मन के विदेशी संबंध परिषद् (डीजीएपी) के विशेषज्ञ और जर्मन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डा. क्रिसचन वेपरफ़ोर्ड ने कहा,

डा. वेपरफ़ोर्ड ने परमाणु समझौते से निकलने के लिए ट्रम्प के संभावित निर्णय और उसके परिणाम के संबंध मे कहा, ट्रम्प का यह फैसला अमेरिकी विश्वसनीयता और आत्मविश्वास को कम करता है, जिससे उत्तर कोरिया के साथ युद्ध का समाधान करना और अधिक कठिन होता है। इस प्रकार उत्तर कोरिया अमेरिका के साथ समझौते को केवल एक सीमित मूल्य तक समझता है।

ट्रम्प के इस दृष्टिकोण पर यूरोप को कैसे प्रतिक्रिया देनी चाहिए के बारे मे उन्होने कहा कि अन्य हस्ताक्षरकर्ताओ को एक संयुक्त बयान मे स्पष्ट करना चाहिए कि वे समझौते के प्रति प्रतिबद्ध रहेगे। लेकिन यह कार्रवाई पूर्ण रूप से निष्पक्ष और विवेकपूर्ण होनी चाहिए। और अमेरिका उससे कोई गलत लाभ न उठा सके।

ट्रम्प के परमाणु करार के खिलाफ होने के संबंध मे यूरोपीय विशेषज्ञ ने कहा कि इस संबंध मे मनोविज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है। अमेरिका में बहुत से लोग अब भी मानते हैं कि तेहरान मे अमेरिका दूतावास पर कब्जा करने के कारण अब भी उन्हे ईरान के साथ परेशानी है।

यूरोपीय संघ और रूस और चीन के साथ संबंधों के बारे में ट्रम्प के दृष्टिकोण से संबंधित सवाल के उत्तर में डॉ. वेपरफ़ोर्ड ने एक बार फिर अमेरिका की विश्वसनीयता मे कमी आने का उल्लेख करते हुए उत्तर कोरियाई संकट के मामले के कठिन होने की ओर संकेत किया और कहा कि इस मामले में, अब ईरान के लिए रूस अधिक महत्वपूर्ण है।

डॉ. वेपरफ़ोर्ड ने साक्षात्कार के अंतिम भाग में कहा कि मूल रूप से ईरान का अलग होना अच्छा नहीं है और अमेरिका का अलग होना भी ऐसा ही है। वाशिंगटन को एक उम्मीदवार साथी होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से अब यह सिर्फ किसी एक मामला मे ऐसा है।

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