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अभिमन्यु

अलेप्पो में सीरियन आर्मी की जीत सीरिया के गृहयुद्ध के अंत की शुरुआत है और ये बात विद्रोहियों का समर्थन करने वाले पश्चिमी देश और सऊदी अरब, तुर्की, इजराइल, क़तर भी समझते हैं इसलिए ये इतने ज्यादा बौखलायें हुए हैं।  पूर्वी अलेप्पो के अंदर ज्यादातर वहाबी विचारधारा के आतंकवादी ग्रुप थे जैसे अल नुस्रा फ्रंट, अहरार अल शाम और इन सभी 12 आतंकवादी समूहों को मिला के नाम दिया गया था आर्मी ऑफ़ कांकेस्ट, इनमे मॉडरेट विद्रोहियों की संख्या तो ना के बराबर थी। जैसे-जैसे सीरियन फौज और उसके समर्थक पूर्वी अलेप्पो में जीत के करीब बढ़ते गये वैसे ही कॉर्पोरेट मीडिया द्वारा झूठ बोलने की गति भी बढ़ती गई।

उदहारण के तौर पर अभी बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि संयुक्त राष्ट्र के ह्यूमन राइट्स ऑफिस के पास पुख्ता सबूत हैं कि सीरिया के नागरिकों को फौज द्वारा निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन सबसे पहली बात ये है कि संयुक्त राष्ट्र का इस नाम से कोई ऑफिस नहीं है, जिस आफिस की बात की जा रही है उसका असली नाम है ऑफिस ऑफ़ यू ऍन हाई कमिश्नर ऑफ़ ह्यूमन राइट्स और दूसरी बात है कि इस आफिस के कमिश्नर हैं जॉर्डन देश का एक राजा जिसका नाम है प्रिंस ज़ेइड रॉड अल हुसैन जो की जॉर्डन के प्रिंस के करीबी हैं। जब जॉर्डन खुद विद्रोहियों का इतना प्रबल समर्थक रहा है तो एक जॉर्डन के राजा की बात पर किस तरीके से विश्वास किया जा सकता है?

अब अगला सवाल उठता है कि ये सारे पश्चिमी और सऊदी समर्थित मीडिया घराने कह रहे हैं कि उन्हें पुख्ता स्त्रोतों से सीरियन आर्मी द्वारा किये जा रहे दमन की जानकारी मिल रही है लेकिन मुद्दे की बात ये है कि आख़िरकार ये पुख्ता स्त्रोत कौनसे हैं और क्या इनके नाम हैं, हर कोई ये कह रहा है कि पुख्ता स्त्रोतों से उसे जानकारी मिली लेकिन ये पुख्ता स्त्रोतों के कोई भी नाम नहीं बता रहा तो ये पुख्ता स्त्रोत कहीं सिर्फ काल्पनिक तो नहीं हैं?

सवाल उठता है कि सीरियन आर्मी की अलेप्पो में जीत से ये कुछ मुल्क इतने बौखलाए हुए क्यों हैं? इसका जवाब अलेप्पो के सामरिक, आर्थिक और राजनैतिक महत्व में छुपा है।  यह गृहयुद्ध शुरू होने से पहले अलेप्पो में 21 लाख से भी ज्यादा लोग रहते थे जो की सीरिया की राजधानी दमिश्क से भी ज्यादा थे, सीरिया के बजट का 60 फीसदी इस गृहयुद्ध से पहले अकेले अलेप्पो शहर से आता था और अलेप्पो में ही सीरिया की ज्यादातर फैक्टरियां थी इसलिए अलेप्पो को सीरिया की इंडस्ट्रियल कैपिटल भी बोला जाता था।

अलेप्पो पर सीरियन आर्मी के कब्ज़े का अर्थ है कि सीरिया के चारों बड़े शहरों दमिश्क, होम्स, हामा और अलेप्पो पर सीरियन फौज का नियंत्रण होना जिसका अर्थ है कि 80 फीसदी से भी ज्यादा रिहायशी इलाके सीरियन फौज के नियंत्रण में होना। अलेप्पो में सीरियन आर्मी के कब्ज़े के बाद से विद्रोहियों को तुर्की से मिलने वाली मदद बन्द हो जायेगी क्योंकि सीरियन तुर्की बॉर्डर अलेप्पो से मात्र 50 मील की दूरी पर है और अलेप्पो पर सीरियन फौज के कब्ज़े का मतलब है विद्रोहियों की सप्लाई लाइन बन्द हो जाना।

सीरियन युद्ध की ग्राउंड जीरो से कवरेज करने वाले साउथ फ्रंट  वेबसाइट के अनुसार अमरीका, इजराइल, सऊदी अरब, तुर्की, क़तर आजर जॉर्डन के 14 बड़े अधिकारियों को सीरियन स्पेशल फोर्सेज ने पूर्वी अलेप्पो में एक बंकर से दबोचा है और इन्ही 14 अधिकारियों को बचाने के लिए अमरीका बार बार सीजफायर की कोशिश कर रहा था।

यहाँ पर एक सवाल यह भी उठता है कि पश्चिमी मुल्कों और कुछ अरब देशों को सीरिया के अंदर लोकतंत्र और मानवाधिकारों की इतनी चिंता क्यों हो रही है? क्या सऊदी अरब में लोकतंत्र है? क्या क़तर में लोकतंत्र है?  सवाल ये भी है कि जब अमरीका को किसी दूसरे देश के द्वारा अपने आंतरिक मामलों में दखल पसंद नहीं है तो अमरीका किसी दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल क्यों दे रहा है?

ओबामा प्रशासन के पास रूस द्वारा अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में हस्तक्षेप के कोई भी पुख्ता सबूत नहीं हैं लेकिन फिर भी ओबामा प्रशासन द्वारा बिना वजह का शोर मचाया जा रहा है और वहीँ दूसरी तरफ ओबामा प्रशासन द्वारा सीरिया में विद्रोहियों को हथियार भेजे जा रहे हैं। तो अमरीका द्वारा ये दोगलापन क्यों?

हकीकत ये है कि अलेप्पो में सीरियन फौज की जीत के बाद सीरियन फौज की स्थिति काफी मज़बूत हो गयी है और सीरिया में हालात सामान्य होने की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं और इसके नतीजन साम्राज्यवादी देशों के एजेंडे धवस्त हो रहे हैं, इसलिए विद्रोहियों के समर्थक देशों में इतनी बौखलाहट है।


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