वसीम अकरम त्यागी
लेखक मुस्लिम टुडे में सह-संपादक है

ऑनलाईन पत्रकारिता का स्तर समझने के लिये प्रतिष्ठित न्यूज पोर्टल जनसत्ता के दो शीर्षक देखिये, (1) मुस्लिम अध्यापक ने छात्रा के साथ आपत्तीजनक फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट की (2) मुसलमान तो पोती से भी शादी कर लेते हैं। अक्सर संघियों की तरफ से इस्लाम को बदनाम करने के लिये प्रोपगेंडा फैलाया जाता है कि मुसलमानो में बेटी, पोती से भी शादी हो जाती है। जबकि यह कौरी बकवास है, और एक तरह मुसलमानों को समाज की नजरो में गिराने के लिये इस तरह के प्रोपगेंडे फैलाये जा रहे हैं, जैसा आप महसूस कर रहे हैं अब मुसलमानों को गालियां देना फैशन बन चुका है, उन्हें बुरा भला कहकर भाजपा जैसी पार्टी में आसानी से अपनी जगह पक्की की जा सकती है, और बुरा भला कहने वाले खुद को नमो भक्त कहने से भी नहीं चूकते। हाल ही में एक स्वंयघोषित साध्वी ने मुसलमानो और सेकुलरों को वीडियो जारी करके खूब गालियां दी हैं, यह साध्वी जिसने एक शादी समारोह में एक महिला को गोली मारकर हलाक कर दिया था, इन दिनों खुद को हिन्दुत्व का लठैत साबित करना चाहती है।

वह सेलकुलर हिन्दुओं और मुसलमानों को कुत्ता, सुअर का बच्चा कहती है। यह सब धर्म के नाम पर हो रहा है। लेकिन हैरानी उस वक्त होती है जब जनसत्ता जैसा प्रतिष्ठित संस्थान इस तरह की वाहियातो में खुद शामिल हो जाता है। ऊपर जिन दो शीर्षकों का उल्लेख किया गया है यह आज के ताजा शीर्षक हैं। जिस तरह लिखा गया है कि मुसलमान पोती से शादी कर लेते हैं क्या जनसत्ता के पास इस बात के प्रमाण हैं कि किसी मुसलमान ने पोती से शादी की हो ? तथ्य और प्रमाण खबरों की जान होता है अगर किसी खबर में तश्य और प्रमाण नहीं हैं तो समझ लीजिये वह खबर झूठी है।

जनसत्ता ने जिस खबर को अपनी वेबसाईट पर प्रकाशित किया है उसमें उन्हीं लोगों के ट्वीट को आधार बनाया गया है जिनमें कहा गया है कि मुसलमान पोती से भी शादी कर लेते हैं। मूलनिवासियों की तरफ से आये दिन हिन्दू धर्म के बारे में तरह तरह की टिप्पणियां की जाती रहती हैं वे सच होती हैं या झूठ यह तो नहीं मालूम लेकिन कभी कोई न्यूज पोर्टल उन टिप्पणियों को आधार बनाकर कोई खबर प्रकाशित नहीं करता। यह क्या साबित करता है ? इससे साबित होता है कि जनस्ता में भी ऐसी मानसिकता घुस आई है जिसका मकसद ही इस्लाम और मुसलमानों पर कीचड़ उछालना है। दूसरी खबर जिसमें एक टीचर और छात्रा का मामला है जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है, यह शीर्षक यह दर्शाने के लिये काफी है कि जनसत्ता हो या मीडिया का कोई भी माध्यम, संस्थान हो उनके अंदर मुसलमानों की तरफ से जहर भरा हुआ है। जिस तरह टीचर की पहचान कराई जा रही है वह यह बताने के लिये काफी है कि खबर लिखने वाली की मंशा क्या है ? वह चाहता है कि एक भीड़ निकले और उस ‘मुस्लिम’ टीचर को मौत के घाट उतार डाले। अपराध को अपराध की गंभीरता से नहीं बल्कि धार्मिक पहचान से पहचाना जा रहा है। जनसत्ता के पत्रकारो ने जैसी हिम्मत ‘मुस्लिम टीचर’ लिखने में दिखाई है क्या ऐसी ही बहादुरी दूसरे मामलो में दिखा सकते हैं ? क्या वे शीर्षक लगायेंगे कि मंदिर के पुजारी ने मंदिर से एलान करके हिन्दुओं द्वारा अखलाक की हत्या कराई ? क्या वे हिम्मत दिखायेंगे कि जुनैद को मुसलमान होने की वजह से हिन्दुओं ने ट्रेन में काट डाला ? क्या इन डायनमाईट से ज्यादा खतरनाक हो चुके पत्रकारो में इतनी हिम्मत है कि वे लिखें कि मुस्लिम जुनैद का कत्ल करने वाले हिन्दू युवक को मिली जमानत ? क्या लिखेंगे कि पहलू खान को हिन्दुओं ने मार डाला ? क्या लिखेंगे कि झारखंड में तीन महीने में 16 मुस्लिम युवकों को हिन्दुओं ने पीट पीट कर मार डाला। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जिन्हें हिन्दू और मुसलमान बनाया जा सकता है। फिलहाल आप बस इतना जान लीजिये कि यह पत्रकारिता का सबसे खराब दौर है। जब जनसत्ता जैसे संस्थान बहक जायें तो किससे उम्मीद की जाये कि वह तथ्यों की पत्रकारिता कर रहा है ? पत्रकारिता की खुद की आचार सहिंता होती है मगर वेब मीडिया ने उस आचार सहिंता को उठाकर रद्दी की टोकरी में डाल दिया है।

पत्रकारिता के कुछ उसूल हैं ये उसूल किसी सरकार या संसद ने नहीं बनाये बल्कि उन लोगों ने बनाये थे जिन्हें शायद यह अंदेशा था कि आने वाले समय में पत्रकारों की जो जमात आयेगी वह दिमागी से रूप से खोखला होगी और उसके अंदर किसी न किसी को लेकर नफरत, पूर्वाग्रह जरूर होगा। इन उसूलो में यह भी शामिल है कि अपराधी को जब तक अपराधी न लिखा जाये जब तक अदालत के द्वारा उसे अपराधी न लिख दिया जाये। मगर इसे मान कौन रहा है, अब आरोप मात्र लग जाना ही अपराधी साबित होने के बराबर है। अनगिनत ऐसे मामले हैं जिनमें मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तारी के तुंरत बाद मीडिया द्वारा आतंकवादी साबित किया गया लेकिन बाद में वे सब अदालत में बेगुनाह होकर बरी हो गये। मीडिया का यह रवैय्या समाज के लिये ठीक नहीं है, यह समाज को पूर्वाग्रह से ग्रस्त बनाने का काम कर रहा है।

सह संपादक मुस्लिम टूडे मैग्जीन

नोट-उपरोक्त लेखक के निजी विचार है कोहराम न्यूज़ लेखक द्वारा कही किसी भी बात की ज़िम्मेदारी नही लेता

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