modi mehbooba

हरी-भरी कश्मीर घाटी पर लंबे समय से खून के छींटे पड़ते रहे हैं – फिर चाहे वह खून अतिवादियों का हो, कश्मीरियों का, सुरक्षा बलों के सदस्यों का, और अब पर्यटकों का भी। हाल में घाटी में एक स्कूल बस पर पत्थर फेंके गए, जिसमें 11 साल के एक बच्चे की मृत्यु हो गई। जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, एक ऐसी सरकार का नेतृत्व कर रहीं हैं जो ऊपर से नीचे तक विचारधारा के आधार पर विभाजित है। महबूबा मुफ्ती ने भारत सरकार से यह अनुरोध किया कि रमजान के पवित्र महीने में कश्मीर में एकतरफा युद्धविराम लागू किया जाए।

भारत सरकारजो कश्मीर पर अप्रत्यक्ष रूप से शासन कर रही हैकी वजह से हिंसा में तेजी से वृद्धि हुई

कश्मीर में पिछले दिनों हिंसा में तेजी से वृद्धि हुई है क्योंकि भारत सरकार, जो वहां पर अप्रत्यक्ष रूप से शासन कर रही है, ने हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा से देने की नीति अपना ली है। स्थानीय लोगों की परेशानियों के प्रति जो थोड़ी-बहुत सहानुभूति और संवेदनशीलता सरकार दिखाती आ रही थी, उसे भी उसने त्याग दिया है। बुरहान वानी की एक फर्जी मुठभेड़ में मौत के बाद वहां विरोध प्रदर्शनों का एक लंबा सिलसिला शुरू हो गया और घाटी के कुंठित व राष्ट्र की मुख्यधारा से स्वयं को अलग-थलग पा रहे युवाओं ने अपने गुस्से का इजहार करने के लिए अपना सबसे प्रिय तरीका अपनाया, और वह था पत्थर फेकना। विरोध प्रदर्शन करने वालों का गुस्सा अब इतने चरम पर है कि उन्हें राज्य द्वारा की जा रही दमनकारी कार्यवाहियों की भी कोई परवाह नहीं है।

पीडीपीजो पहले अलगाववाद की भाषा में बात करती थीने हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा से हाथ मिलाया

यूपीए सरकार के दौर में कश्मीर के मामले में बातचीत और आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही – दोनों एक साथ की जा रही थीं। अब इसका स्थान अति-राष्ट्रवादी नीति ने ले लिया है और सरकार ने सुरक्षाबलों को कार्यवाही करने की खुली छूट दे दी है। इसके कारण घाटी में हिंसा की घटनाओं में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। सन् 2018 में अब तक 40 अतिवादी, 25 सैनिक और 37 नागरिक अपनी जानें गंवा चुके हैं। पीडीपी, जो पहले अलगाववाद की भाषा में बात करती थी, ने उस हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा से हाथ मिलाया जो राज्य को कुछ हद तक स्वायत्ता देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के पक्ष में थी। जाहिर है कि यह सब केवल सत्ता हासिल करने के लिए किया गया। अब तो भाजपा यह छिपाने का प्रयत्न तक नहीं कर रही है कि वह अल्पसंख्यकों की विरोधी है। महबूबा मुफ्ती एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई की स्थिति में फंस चुकी हैं। वे न तो ऐसी नीतियां लागू कर पा रही हैं जिनसे स्थानीय निवासियों के गुस्से को ठंडा किया जा सके और उनके घावों पर मरहम लगाई जा सके और ना ही वे अपनी गठबंधन साथी भाजपा की दादागिरी का विरोध कर पा रही हैं। वे चुपचाप केंद्र द्वारा राज्य में की जा रही दमनकारी कार्यवाहियों को देख रही हैं। वह एकमात्र मुद्दा, जिस पर उन्होंने अपनी आवाज उठाई, वह था कठुआ बलात्कार और हत्याकांड। इस मुद्दे पर भाजपा नेताओं को मात खानी पड़ी।

हिंसा के बढ़ते जाने से राज्य का पर्यटन उद्योग प्रभावित हो सकता है और यही राज्य के निवासियों और वहां की सरकार की आय का प्रमुख साधन है। आम कश्मीरी हम सबकी सहानुभूति का पात्र होना चाहिए क्योंकि वह दो पाटों के बीच पिस रहा है। चूंकि प्रजातांत्रिक ढंग से विरोध करने के रास्ते बंद हैं और बातचीत की कोई संभावना नहीं है, इसलिए लोगों का असंतोष हिंसक रूप ले रहा है। मुख्यमंत्री लगातार संवाद की ज़रुरत पर जोर दे रही हैं परंतु भाजपा की केन्द्र सरकार उनकी एक नहीं सुन रही है। वह देश के अन्य भागों में चुनावी लाभ पाने के लिए कश्मीर में दमनचक्र चलाने पर आमादा है।

कश्मीर घाटी में हिंसा और असंतोष के लिए केवल पाकिस्तान को दोषी ठहराना तथ्यों को झुठलाना होगा। सच यह है कि कश्मीर में असंतोष और हिंसा के पीछे कई कारक हैं और पाकिस्तान की भूमिका उनमें से केवल एक है। अलकायदा के क्लोन कश्मीर घाटी में सक्रिय हैं और वहां सेना की भारी मौजूदगी, स्थिति को सुधारने में सहायक नहीं हो रही है। सेना का मूल कर्तव्य देश की सीमाओं की दुश्मन से रक्षा करना है परंतु कश्मीर में एक बड़े नागरिक इलाके को दशकों से सेना के नियंत्रण में सौंप दिया गया है। सेना का दृष्टिकोण इससे जाहिर है कि उसके एक अधिकारी ने फारूक अहमद दर नामक एक बुनकर, जो अपना वोट देने आया था, को मानव ढाल की तरह इस्तेमाल किया। इससे भी बुरी बात यह है कि उसके वरिष्ठ अधिकारियों ने उसका बचाव किया। दर को पांच घंटे से अधिक समय तक जीप पर बांधकर घुमाया गया और अब उसे अपने इस अपमान के साथ जीवनभर रहना होगा। क्या इस तरह की कार्यवाहियों के चलते लोग सामान्य जीवन जी सकेंगे? पहले तो राज्य विधानसभा को स्वायत्ता देने की बात की भी जाती थी, जैसा कि विलय की संधि में प्रावधान था। परंतु वर्तमान सत्ताधारी स्वायत्ता की बात तक करना नहीं चाहते। संवाद, प्रजातंत्र का आवश्यक हिस्सा है परंतु कश्मीर से संवाद पूरी तरह से गायब है। इससे पहले कुछ नेताओं ने कश्मीर में शांति स्थापित करने के कई प्रयास किए थे। इनमें प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत पर आधारित प्रस्ताव शामिल था। वाजपेयी, पाकिस्तान के साथ रिश्ते बेहतर करने के पक्ष में भी थे। महबूबा मुफ्ती वर्तमान शासकों को बाजपेयी की नीति की याद दिलाने की भरसक कोशिश कर रही हैं परंतु कोई उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है।

बढ़ता जा रहा है मुफ्ती सरकार के विरूद्ध लोगों का गुस्सा

यूपीए-2 ने कश्मीर समस्या के सुलझाव के लिए वार्ताकारों का एक दल नियुक्त किया था जिसमें दिलीप पदगांवकर, एमएम अंसारी और राधाकुमार शामिल थे। उन्होंने कश्मीर के विभिन्न समूहों से विस्तृत बातचीत की और उसके आधार पर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं, जिनमें मूलतः राज्य की विधानसभा को स्वायत्ता दिए जाने, संवाद स्थापित करने और पाकिस्तान के साथ संबंध बेहतर बनाने पर जोर दिया गया था। परंतु उनकी रपट धूल खा रही है। अब समय आ गया है कि इस रपट, जो कि कश्मीर में शांति स्थापना के लिए हाल में उठाया गया  सबसे अहम कदम था, को झाड़-पोंछकर बाहर निकाला जाए। कश्मीर की सरकार में भाजपा का रूख नकारात्मक रहा है। उसने एक मुस्लिम-बहुल राज्य में मुसलमानों को अलग-थलग कर दिया है। क्या महबूबा मुफ्ती अपनी बात मजबूती से कह सकेंगी? क्या वे कश्मीर के लोगों की प्रजातांत्रिक महत्वाकांक्षाओं को आवाज दे सकेंगी? मुफ्ती सरकार के विरूद्ध लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। सरकार की ओर से घोषित युद्ध विराम एक स्वागतयोग्य कदम है परंतु इसके साथ-साथ, अन्य मानवीय नीतियां और कदम उठाए जाने की जरूरत है। तभी इस बात की संभावना बन सकेगी कि कश्मीर में फिर से शांति लौट सके।

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटीमुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

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