नई दिल्ली | पूर्व भारतीय नौसैनिक कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने जासूसी और देश को अस्थिर करने का प्रयास करने के आरोप में फांसी की सजा सुनाई है. पाकिस्तान की इस कार्यवाही पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा की कुलभूषण के खिलाफ पाकिस्तान के पास कोई भी सबूत नही है. उसके पास वैध पासपोर्ट है जो यह साबित करता है की वो जासूस नही है.

इसके अलावा भी भारत ने कई तर्क देकर साबित करने की कोशिश की है की पाकिस्तान झूठ बोल रहा है. खुद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान की कार्यवाही को एक सुनियोजित हत्या करार दिया है. इस पुरे मामले में पाकिस्तानी मीडिया की भूमिका बेहद चौकाने वाली है. पाकिस्तान की ज्यादातर मीडिया ने कुलभूषण के पक्ष में आवाज बुलंद कर सरकार को आइना दिखाने का काम किया है.

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पाकिस्तान के मशहूर अख़बार ‘डॉन’ लिखता है की भारत-पाकिस्तान के संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं और जाधव को फांसी की सजा का फैसला सुनाने से अनिश्चितता और बढ़ गई है, साथ ही जाधव को सजा सुनाने के बावजूद कई अनसुलझे सवालों के जवाब मिलना बाकी है. एक अन्य अखबार लिखता है की कही पाकिस्तानी सेना ने कुलभूषण जाधव को फांसी सुनाकर जल्दी तो नही की.

डेली टाइम्स ने दो कदम आगे बढ़ते हुए पाकिस्तानी अधिकारियो पर ही सवाल खड़े कर दिए. अख़बार में अधिकारियो से पुछा गया की क्या आपने जाधव से सारी सूचनाये प्राप्त कर ली है या केवल जाधव को फांसी पर लटकाने की जल्दी है. पाकिस्तान के इस कदम को घातक बताते हुए अख़बार लिखता है की इससे दोनों देशो के बीच छद्म युद्ध छिड़ने के आसार है जिसके काफी गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते है.

पाकिस्तान मीडिया का कुलभूषण के प्रति यह रुख देखकर आश्चर्य होता है. क्योकि पाकिस्तानी मीडिया ने जिस तरह निष्पक्ष होकर अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा किया है, ऐसा भारतीय मीडिया में कभी देखने को नही मिलता. हमारा मीडिया निष्पक्ष न होकर एकपक्षीय हो गया है. शायद ही किसी मीडिया में इतनी हिम्मत हो की वो सरकार के खिलाफ बोल सके. एक बार NDTV ने इस तरह की कोशिश की थी.

लेकिन उसका अंजाम क्या हुआ , यह हम सब देख चुके है. जेएनयु की घटना हो या एंकर रविश कुमार की निडर रिपोर्टिंग, केवल NDTV ने थोडा बहुत सच बोलने का साहस किया. लेकिन सरकार ने उसके खिलाफ ही कार्यवाही करने के फैसला किया और चैनल पर एक दिन का प्रतिबंध लगा दिया गया. अब सवाल यह उठता है की अगर पत्रकारिता भी एकपक्षीय हो गयी तो असल खबर जनता तक कैसे पहुंचेगी ? फिर तो पत्रकारिता का कोई मतलब ही नहीं रह गया.

कुलभूषण के मामले में पाकिस्तान की पत्रकारिता देखकर लगता है की भारतीय मीडिया को उनसे सीखना चाहिए की निष्पक्ष पत्रकारिता क्या होती है. एक हिन्दू और सरकार द्वारा घोषित तथाकथित जासूस के पक्ष में लिखकर वहां की मीडिया ने एक मिसाल पेश की है. जो भारतीय मीडिया के लिए एक सबक है. उम्मीद करते है की यह सूरत एक दिन बदलेगी और मीडिया अपनी वो ही पहचान दोबारा बना पायेगा जिसके लिए वो जाना जाता है.

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