गुजरात हाईकोर्ट ने सोमवार को साल 2002 के नरोदा पाटिया अल्पसंख्यकों के जनसंहार मामले मे महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तीन अभियुक्तों को 10-10 साल की कैद और एक-एक हजार रुपये का जुर्माने की सज़ा सुनाई है।

कोर्ट ने अभियुक्त उमेश भरवाड, पद्मेंद्रसिंह राजपूत और राजकुमार चौमल को ये सज़ा सुनाई है। निचली अदालत ने साल 2012 में इन तीनों को बरी कर दिया था। तीनों को पत्थरबाजी और आगजनी करने के मामले में दोषी पाया गया है।

ध्यान रहे 28 फ़रवरी 2002 को अहमदाबाद के नरोदा पाटिया इलाके में हुए सांप्रदायिक दंगे में कम से कम 97 मुसलमानों की हत्या कर दी गई थी। 16 साल से भी ज्यादा समय के बाद इस मामले में हाई कोर्ट का फैसला सामने आया है।

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इस मामले मे 31 अगस्त 2012 को कोर्ट ने तत्कालीन विधायक और मोदी सरकार की पूर्व मंत्री कोडनानी को “नरोदा इलाके में दंगों की सरगना” क़रार दिया था और 28 साल क़ैद की सज़ा सुनाई थी। वहीं बाबू बजरंगी को आजीवन कारावास की सज़ा और बाक़ी दोषियों को 21 सालों की सज़ा दी गई थी। लेकिन हाई कोर्ट ने कोडनानी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

अदालत का कहना था कि पुलिस ने कोई ऐसा गवाह पेश नहीं किया जिसने माया कोडनानी को कार से बाहर निकलकर भीड़ को उकसाते देखा हो। कोर्ट ने बाबू बजरंगी की सज़ा को भी आजीवन कारावास से कम कर 21 साल कर दिया।

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