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जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी द्वारा आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ दिये गए बयान को लेकर बवाल मच गया है। मौलाना मदनी और उनके परिवार पर सीधे तौर पर कॉंग्रेस की दलाली का गंभीर आरोप लग रहा है।

आखिर क्या कहा मौलाना महमूद मदनी ने –

मौलाना मदनी ने अपने बयान में कहा, ओवैसी को इंडियन मुस्लिम का नेता नहीं बनने देंगे। उन्हे केवल आंध्रा और तेलंगाना तक ही सीमित होना पड़ेगा। उन्होने कहा कि उन्हे कतई मंजूर नहीं की ओवैसी हैदराबाद से बाहर निकले। उन्होने कहा कि ओवैसी को मुस्लिमों का नेता बनना है तो हैदराबाद के मुसलमानो का नेता बने।

बयान के लिए देखे वीडियो –

मौलाना मदनी के बयान पर सोशल मीडिया में प्रतिक्रिया –

सरफराज कठारी ने लिखा, ”मदनी साहेब बोलते है के देश का अधिसंख्यक बहुसंख्यक सेक्युलर है और आप तो इनके शान में कशीदे गढ़ते रहते है, चौड़ाई देते है, मदनी साहेब आप तो राजनीतिक दल से हमेशा जुड़े रहे है चलिए मदनी साहेब 2019 में चुनाव लड़ लीजिये जिसमे मुस्लिम 20% से कम हो और चुनाव जीत कर दिखा दीजिये।दल कोई भी हो , लोकसभा कोई भी हो बस शर्त इतनी के उसमे 20% से कम मुस्लिम हो। बाकि आपके मदनी परिवार का टुकड़ाखोरी के इतिहास का भी लाज अगर बहुसंख्यक ने रख कर जीता दिया तो आपको सलाम रहेगा। जिसपर 20% से कम मुस्लिम होते है आम मुस्लिम भी मुश्किल से जीत पाता है आपके तो दाढ़ी टोपी भी है, भूल जाइए। वो नही याद करेगा के कैसे आपने मुसलिमो का सौदा करके , मुस्लिमो के साथ नाइंसाफी के बाद भी सर्टिफिकेट देकर कितना बड़ा एहसान किया, वो भूल जाएगा के आपके वालिद मोहतरम ने 1980 में मोरादाबाद ईदगाह में हुए आधुनिक भारत के जालियांवाला बाग के बाद जिसमें कई लोगो ने हाथ खड़ा कर लिया था जिसका दबाव इंदिरा पर काफी था या 1992 के बाद भारत खासकर भारत के हिन्दुओ के इज्जत बचाने के लिए क्या किया जबके अगर तब बदमाशी नही होती तो दबाव में सही कुछ तो इंसाफ मिल ही जाता ।

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नईम अख्तर लिखते है, एक तरफ तो मौलाना महमूद मदनी साहब कहते हैं कि गंगा जमुनी तहजीब भाईचारा वाला देश है लोकतंत्र की दुहाई देते हैं सबसे अमन सकून वाला देश भारत है मुसलमानों के लिए ठीक है। इससे कोई इनकार नहीं है। अब इन्हीं बातों का इंकार खुद मौलाना महमूद मदनी अपनी जबान से करते हैं जब सब कुछ सही है खुशहाली है भाईचारा है। गंगा जमुनी तहजीब है कानून का राज है संविधान का राज है तो उसी संविधान ने हमको राइट दिया है कि हम चुनाव लड़े ब हैसियत मेंबर ऑफ पार्लिमेंट लोकसभा में बैठे विधानसभा में जाएं। सर्वधर्म सर्व जाति का देश है तो उस लोकसभा विधानसभा में मुसलमान अपना बैनर अपनी पार्टी लेवल से क्यों नहीं जा सकता क्या जरूरी है कि कांग्रेस के नाम पर नेता बन कर ही जाए , समाजवादी के नाम पर नेता बन कर जाए , बसपा का नेता बनकर जाए अपनी खुद की कुर्सी लेकर ना जाए मौलाना साहब को बात क्लियर करनी चाहिए या तो इंकार करें कि कानून का संविधान का राज नहीं है भाई चारा नहीं है गंगा जमुनी तहजीब नहीं है। इंसाफ कमजोर हुआ है या तो इस बात पर मोहर लगाएं कि हर किसी को चुनाव लड़ने और राजनीति करने का हक है, नहीं तो खुला ऐलान करें कि आप Indian National Congress को वोट दो स्टेट लेवल के चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी को वोट दो महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस को वोट दो बंगाल में ममता बनर्जी को हैदराबाद में टीआरएस को वोट दो स्टेट वाइज फरमान जारी करें ??

– पत्रकार जैगम मुर्तजा ने लिखा, ”मैं ओवैसी समर्थक नहीं हूं। मैं हर चुनाव में उनकी उछलकूद और बेवजह बयानबाज़ी का भी विरोधी हूं। मैं इस बात के पक्ष में भी नहीं हूं कि वो दिल्ली नगर निगम और गजरौला नगर पंचायत में अपने वोट कटवा उम्मीदवार उतारें। लेकिन जिस भाषा का इस्तेमाल महमूद मदनी ने किया है वो उससे भी ज़्यादा ग़लत है। अगर वो मानते हैं कि ओवैसी बीजेपी की मदद करते हैं तो इस बात के दर्जनों उदाहरण हैं जब ख़ुद उन्होंने बीजेपी की मदद की। मेरे यहां से चुनाव लड़ चुके हैं इसलिए मैं मदनी को ज़्यादा क़रीब से जानता हूं। बहरहाल, मुद्दा ये नहीं है। सवाल ये है कि मुसलमान अपने विकल्प क्यों ख़त्म करें? लोकतंत्र भागीदारी और हिस्सेदारी से ज़िंदा होता है। ये भी सही है कि सेक्युलरिज़्म की ज़रूरत और इसको बचाने की ज़िम्मेदारी अल्पसंख्यकों की ही है। बहुसंख्यक को सेक्युलर या ग़ैर सेक्युलर होने से फर्क़ नहीं पड़ता। लेकिन मुसलमान अपनी राजनीतिक मूर्खता से बाहर आने को तैयार नहीं हैं। मसलेहत और राजनीतिक विकल्प जैसे शब्दों के अर्थ समझने को तैयार नहीं हैं। एक तरफ महमूद मदनी, कल्बे जव्वाद और तौक़ीर रज़ा जैसों के फेर में आलू बने जा रहे हैं। हर सब्ज़ी गोश्त में पक रहे हैं। दूसरी तरफ तमाम राजनीतिक पार्टियों को गाली दे देकर अपने विकल्प ख़त्म कर रहे हैं। अरे भैया जहां जिससे फायदा हो जुड़िए। मैं तो कहता हूं कि घर में चार भाई हैं तो चारों अलग-अलग पार्टी से जुड़ो लेकिन वोट समझदारी से साथ करो। वोट उसको दो जो तुम्हारी सुन रहा हो। जहां पार्टी से नहीं निभ रही वहां मतलब का उम्मीदवार चुनो। तेलंगाना, आंध्र और कर्नाटक में अगर ओवैसी के उम्मीदवार अच्छे और जिताऊ हैं तो जिताने में हर्ज़ क्या है? जिस दौर में सेकुलरिस्ट भी मुसलमानों को अछूत मान रहे हैं वहां सौदेबाज़ी या कथित दलाली के लिए ही सही, ओवैसी, अजमल की ही नहीं, कम्युनिस्ट, आरएलडी, गोंडवाना और आईएनएलडी जैसी पार्टिंयां भी मरने मत दो। ये सब ज़िंदा रहेंगे तो राजनीति करने और प्रतिनिधित्व हासिल करने के काऊंटर खुले रहेंगे। वरना आज प्रतिनिधित्व ख़त्म किया रहा है, कल ये वोट का अधिकार भी छिनवा देंगे। अल्लाह अल्लाह ख़ैर सल्ला…”

– वहीं आमिर सिद्दीकी लिखते है, ‘जो लोग महमूद मदनी को गालियां दे रही है उनसे कहना चाहता हूं कि पहले आप यह तय करें कि आप के गाली देने का मैयार क्या है क्योंकि महमूद मदनी ने जो इस वक्त किया है वह आज के हालात को देखते हुए बहुत ही दुरुस्त और बहुत ही सही फैसला है बल्कि मैं कहता हूं कि इससे बेहतर उनके अल्फाज हो ही नहीं सकते थे। जैसे हजरत मौलाना शाह इस्माइल शहीद देहलवी रहमतुल्लाह अलेही ने अपनी इज्जत की परवाह किए बगैर एक रण्डी के घर में जा कर दीनी बयान किया था ताकि वह सुधर जाए और लोगों की किसी भी बात की परवाह नहीं की थी। इसी तरह महमूद मदनी ने बयान में यह कहा कि मैं उवैसी को जीतने नहीं दूंगा क्योंकि वह जानते थे कि जब मैं ओवैसी का नाम लूंगा तो सारे लोग मुत्ताहिद और सब इखट्टा हो जाएंगे और सब ओवैसी को सपोर्ट करने लगेंगे वह चाहते तो नाम नहीं लेते और उसके बिना भी अपनी बात रख सकते थे लेकिन उन्होंने नाम लेकर यह जाहिर कर दिया कि वह ओवैसी की सपोर्ट चाहते हैं वो सिर्फ उवैसी को ही जिताना चाहते हैं मगर अफसोस लोगों के कम अक्ली पर कि वह समझने की कोशिश के बजाय गालियां देने लगते हैं। और दूसरी बात यह है कि अगर मदनी साहब खुलकर उवैसी का सपोर्ट करते और उसके लिए अपील करते तो पूरी मीडिया में बवाल मच जाता कि मदनी साहब ने ओवैसी का सपोर्ट किया है और अब मुसलमान एक जुट हो चुका है और फिर वही 2014 के हालात पैदा हो जाते जो कि मुसलमानों की सियासत के लिए कितना नुकसान दे है ये सिर्फ अहल ए सियासत ही समझ सकते हैं। यह तो वह चीजें हैं जो मेरे जैसे नासमझ के जहन में आ गई तो ज़रा सोचो तो सही कि मदनीजैसा अजीम शख्स इतना बचकाना बयान जिससे सारे लोग उसके मुखालिफ हो जाएं कैसे दे सकता है??? क्योंकि इसमें मदनी का कोई फायदा नहीं है बल्कि मदनी ने मुसलमानों के हालात बदलने के लिए और उन्हें एकजुट करने के लिए तमाम मुखालिफ लोगों की गालियां और और तमाम लोगों के दलाली के इल्जाम अपने सर ले लिया है। इसलिए मैं कहता हूं कि मदनी साहब तुम पर सलाम है तुम पर अल्लाह की रहमत नाजिल हो और उवैसी की कामयाबी के लिए दिल से दुआ करता हूं और उम्मीद बल्कि यकीन करता हूं कि मदनी साहब भी उवैसी की जीत के लिए दुआ करेंगे इंशा अल्लाह और अगर इसके खिलाफ मदनी साहब चाहते हैं तो फिर हम दुआ करते हैं कि अल्लाह ताला उन्हें उनके मकसद में नाकाम बनाए। और अल्लाह सारे मुसलमानों को सही समझ अता फरमाए और इंतिशार से बचाए। आमीन

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