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गुजरात के जुनागढ़ जिले के मांगरोल पोर्ट पर मुसलमान मछुआरों को धार्मिक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। उन्हे मछली पकड़ने के लिए नाव नहीं लगाने दी जा रही है।

जानकारी के अनुसार, जिन नावों के मालिक मुसलमान हैं उन्हें मांगरोल बंदरगाह पर नहीं लगाने दिया जाता। बता दें कि आजादी के पहले यहां मुसलमान शासकों का राज था उस समय से मांगरोल कस्बे में मुसलमान ही अधिक संख्या में हैं। लेकिन अब उन्हे भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है।

मांगरोल बोट एसोसिएशन के अध्यक्ष हनीफ पटेल बताते हैं, “मांगरोल में मछली पकड़े वाली नौकाओं समेत कुल 1800 नावें हैं। इसमें से मुसलमानों के पास तकरीबन 120 मछली पकड़ने वाली नौकाएं हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से वे इन्हें मंगलोर पोर्ट पर नहीं लगा सकते। इसकी वजह कुछ भी नहीं सिर्फ भेद भाव हैं और इसके जरिए हमारी रोजी रोटी पर प्रहार किया जा रहा है। मुसलमानों को देवभूमि द्वारका के ओखा पोर्ट में अपनी नावों को लगाना पड़ता है जो मंगलोर से ढाई सौ किलोमीटर दूर है।”

Courtesy: Lokbharat

उन्होने बताया कि मांगरोल में रोजगार का कोई दूसरा साधन नहीं है। कोई उद्योग नहीं है। मछली पकड़ कर ही अपनी रोजी चलाई जा सकती है। पिछले डेढ़ दशक से यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ यही है। किसी तरह के बवाल से बचने के लिए संख्या में ज्यादा होने के बाद भी समुदाय के लोगों ने मंगलोर पोर्ट छोड़ कर ओखा जाना स्वीकार कर लिया है।

वहीं फिशरी डिपार्टमेंट के इंचार्ज सुपरीटेंडेंट पीआर राडा का कहना है, “मांगरोल पोर्ट पर धर्म के आधार कोई भेदभाव नहीं है, लेकिन वहां की क्षमता ही महज 400 नावों की है। जबकि मांगरोल में ही 1800 नावें हैं। क्षमता को लेकर ही दिक्कत है। सरकार जल्द ही इसे 1200 तक बढ़ाने की योजना बना रही है।”

ऐसे में मछुआरे अब्दुल सामा सवाल उठाया कि अगर मांगरोल पोर्ट पर सिर्फ 400 नावों को ही हैंडल कर पाने की क्षमता है तो फिर हिंदू मछुआरों को भी दूसरे पोर्ट पर जाना चाहिए लेकिन सिर्फ मुसलमानों की नावों के ही वहां लगाने पर रोक क्यों है।

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