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तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में ही जीत हासिल कर ली है। उन्होने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी मुहर्रम इन्स को बड़े अंतर से हराया है। उन्हे 53% जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी मुहर्रम इंचे को 31% वोट मिले हैं।

तुर्की मे एर्दोगान की जीत का भारत के लिए कई अहम मायने रखती है। दरअसल, उन्होने भारत की सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट का समर्थन किया हुआ है साथ एनएसजी में एंट्री का भी वह पुरजोर समर्थन करते हैं। तुर्की अमेरिका का करीबी सहयोगी और आतंक के खिलाफ लड़ाई में दोनों देश मिलकर लड़ रहे हैं।

बता दें कि एरदोगन 2014 में तुर्की का राष्ट्रपति बनने से पहले 11 साल तक तुर्की के प्रधानमंत्री थे। आधुनिक तुर्की के संस्थापक कमाल अतातुर्क के बाद से अर्दोआन तुर्की के सबसे ताक़तवर नेता हैं।

एर्दोगान अब अकेले वो शख़्स होंगे जो वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर, मंत्रियों, जजों और उप राष्ट्रपति की नियुक्ति करेंगे। वे ही देश की न्यायिक व्यवस्था में दखल दे सकेंगे, वो ही देश में बजट का बंटवारा करेंगे और ये उनका ही व्यक्तिगत फ़ैसला होगा कि साल 2016 के सेना के असफल तख़्तापलट की कोशिश के बाद लगे आपातकाल को हटाएं या लागू रखें।

वह न सिर्फ़ अगले पांच साल के लिए सरकार के सर्वेसर्वा बने रहेंगे बल्कि वो साल 2023 में भी चुनाव लड़ सकते हैं और जीतने पर साल 2028 तक सत्ता में बने रह सकते हैं।

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