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देश में मुस्लिमों के लगातार गिरते प्रतिनिधित्व को लेकर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फाउंडर मेंबर कमाल फारुखी ने कहा कि सरकारों को जानबूझकर मुस्लिम बहुल सीटों को SC/ST में रिजर्व करना चाहिए।

फारुखी ने कहा कि मुस्लिम आबादी वाली सीटों को आरक्षित करके प्रतिनिधित्व को और भी कम कर दिया जाता है। आरोप लगाया कि ऐसा जानबूझकर किया जाता है। बता दें कि आज़ादी के बाद से 2014 के लोकसभा चुनावों में सबसे कम 22 मुसलमान उम्मीदवार ही जीतकर संसद में पहुंचे। इससे पहले 1957 में 23 मुसलमान चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे।

वहीं एएमयू, अलीगढ़ के प्रोफेसर शकील समदानी का कहना है कि ̔ सिर्फ 1980-84 का ही वो दौर था जब मुसलमान 49 और 42 के बड़े नम्बर के साथ लोकसभा पहुंचे थे।लेकिन उसके बाद से यह नम्बर नीचे की ओर गिरता चला गया। 25 और 30 के आंकड़ों में यह नम्बर उलझकर रह गया. सिर्फ 1999 में एक बार जरूर 34 मुस्लिम उम्मीदवार जीते थे।

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बता दें कि SC/ST कोटे के तहत रिजर्व सीटों पर केवल SC/ST समुदाय के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 3 के साथ पठित, भारत के संविधान के अनुच्छेतद 330 में निहित प्रावधान द्वारा लोक सभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आबंटन, संबंधित राज्य में, उनकी कुल जनसंख्या के अनुपात के आधार पर किया जाता है।

अनुसूचित जातियों के लिए, लोक सभा में 84 सीटें आरक्षित हैं। लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं। लोकसभा में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए कुल 131 सीटें आरक्षित हैं तथा देश की कुल मतदाताओं की इन वर्गों की 20 फीसदी से अधिक है।

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