प्रसिद्ध गीतकार गुलजार ने देश को आज भी सांस्कृतिक गुलामी में मुक्त करार दिया. उनका मानना है कि भारत राजनीतिक आजादी हासिल कर चूका है लेकिन वह अब भी सांस्कृतिक आजादी नहीं प्राप्त कर पाया है.

गुलजार ने कहा, गैर हिंदी भाषाओं को आंचलिक कहना गलत है. ये देश की प्रमुख भाषाएं हैं. तमिल प्राचीन और प्रमुख भाषा है. गुजराती, मराठी, बंगाली और अन्य भाषाएं भी ऐसी हैं. गुलजार ने कहा, अगर कॉलेजों में ‘पैराडाइस लोस्ट’ जैसी कृतियों को पढ़ाया जा सकता है तो कालिदास, युधिष्ठिर और द्रौपदी को क्यों नहीं पढ़ाया जा सकता? ये कृतियां हमारी संस्कृति के ज्यादा नजदीक है, जिसे देशभर में हर कोई समझ सकता है.

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उन्होंने कहा, ”इसमें कोई शक नहीं है कि हमें राजनीतिक आजादी मिली लेकिन सांस्कृतिक आजादी नहीं. हम औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं हुए.” गुलजार ने कहा, ”जब नील आर्मस्ट्रांग की मौत हुई तो मुझे दुख हुआ कि भारत में किसी ने भी उनके बारे में नहीं लिखा. मेरे लिए वह मानवता का प्रतीक थे. मैंने एक कविता लिखी. यह दुखद है कि हम टुकड़ों में जिंदगी जीते हैं क्योंकि हमें यह आसान लगता है.’

उन्होंने कहा, ”मैंने डॉ. कलबुर्गी पर भी लिखा जिनकी धारवाड़ में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी हालांकि वह भौगोलिक रूप से अलग स्थान से ताल्लुक रखते थे और उन्होंने अलग भाषाओं में लिखा. मैंने इस घटना पर प्रतिक्रिया दी और कविता के जरिए अपनी भावनाएं जाहिर की. कविता कवि की भावनाओं के सिवाए कुछ भी नहीं है.”