ravish kumar

न्यूज़ डेस्क । दिल्ली के एक स्कूल में हिंदू और मुस्लिम बच्चों को अलग अलग सेक्शन में बाँटने की घटना सामने आने के बाद विवाद शुरू हो गया है। इस पूरे मामले पर एनडीटीवी के पत्रकार रविश कुमार ने तंज कसते हुए कहा कि अब कक्षाओं को भी हिंदू और मुसलमान में बाँट देना चाहिए। इस पूरे मामले में उन्होंने राजनीति को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि देश की राजनीति हमें बाँट रही है। अब हिंदुस्तान भी बचेगा क्या।

एक फ़ेस्बुक पोस्ट के ज़रिए रविश कुमार ने पूरे मामले में अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने लिखा,’उत्तरी दिल्ली नगर निगम का एक स्कूल है, वज़ीराबाद गांव में। इस स्कूल में हिन्दू और मुसलमान छात्रों को अलग-अलग सेक्शन में बांट दिया गया है। इंडियन एक्सप्रेस की सुकृता बरूआ ने स्कूल की उपस्थिति पंजिका का अध्यनन कर बताया है कि पहली कक्षा के सेक्शन ए में 36 हिन्दू हैं। सेक्शन बी में 36 मुसलमान हैं। दूसरी कक्षा के सेक्शन ए में 47 हिन्दू हैं। सेक्शन बी में 26 मुसलमान और 15 हिन्दू हैं। सेक्शन सी में 40 मुसलमान। तीसरी कक्षा के सेक्शन ए में 40 हिन्दू हैं। सेक्शन बी में 23 हिन्दू और 11 मुसलमान। सेक्शन सी में 40 मुसलमान। सेक्शन डी में 14 हिन्दू और 23 मुसलमान। चौथी कक्षा के सेक्शन ए में 40 हिन्दू, सेक्शन बी में 19 हिन्दू और 13 मुस्लिम। सेक्शन सी में 35 मुसलमान। पांचवी कक्षा के सेक्शन ए में 45 हिन्दू, सेक्शन बी में 49 हिन्दू, सेक्शन सी में 39 मुस्लिम और 2 हिन्दू। सेक्शन डी में 47 मुस्लिम।’

इस मामले में स्कूल टीचर के बयान भी आया है। इस बारे में बताते हुए रविश ने लिखा,’ प्रिंसिपल का तबादला हो गया तो उनकी जगह स्कूल का प्रभार सी बी सहरावत के पास है। सेक्शन का बदलाव एक मानक प्रक्रिया है। सभी स्कूलों में होता है। यह प्रबंधन का फैसला था कि जो सबसे अच्छा हो किया जाए ताकि शांति बनी रहे, अनुशासन हो और पढ़ने का अच्छा माहौल हो। बच्चों को धर्म का क्या पता, लेकिन वे दूसरी चीज़ों पर लड़ते हैं। कुछ बच्चे शाकाहारी हैं इसलिए अंतर हो जाता है। हमें सभी शिक्षकों और छात्रों के हितों का ध्यान रखना होता है।’

राजनीति पर हमला करते हुए रविश ने लिखा की राजनीति हमें लगातार बांट रही है। वह धर्म के नाम एकजुटता का हुंकार भरती है मगर उसका मकसद वोट जुटाना होता है। एक किस्म की असुरक्षा पैदा करने के लिए यह सब किया जा रहा है। आप धर्म के नाम पर जब एकजुट होते हैं तो आप ख़ुद को संविधान से मिले अधिकारों से अलग करते हैं। अपनी नागरिकता से अलग होते हैं। असली बंटवारा इस स्तर पर होता है। एक बार आप अपनी नागरिकता को इन धार्मिक तर्कों के हवाले कर देते हैं तो फिर आप पर इससे बनने वाली भीड़ का कब्ज़ा हो जाता है जिस पर कानून का राज नहीं चलता। असहाय लोगों का समूह धर्म के नाम पर जमा होकर राष्ट्र का भला नहीं कर सकता है, धर्म का तो रहने दीजिए। आप ही बताइये कि क्या स्कूलों में इस तरह का बंटवारा होना चाहिए? बकायदा ऐसा करने वाले शिक्षक की मानसिकता की मनोवैज्ञानिक जांच होनी चाहिए कि वह किन बातों से प्रभावित है। उसे ऐसा करने के लिए किस विचारधारा ने प्रभावित किया है।

पढ़िए रविश की पूरी रिपोर्ट 

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