criminal

अपराध की परिभाषा भिन्न-भिन्न रूपों में की गई है, जैसे अपराध समाजविरोधी क्रिया है. अपराध को हम परिभाषित कर सकते है की जैसे किसी नगरपालिका के बनाए नियमों का उल्लंघन कर यदि कोई रात में बिना बत्ती जलाए साइकिल पर नगर की सड़क पर चले अथवा बिना पर्याप्त कारण के ट्रेन की जंजीर खींचकर गाड़ी खड़ी कर दे, तो वह भी उसी प्रकार दोषी माना जाएगा, जिस तरह कोई किसी की हत्या करने पर. किंतु साधारण अर्थ में लोग अपराध को हत्या, डकैती आदि जधन्य अपराधों के पर्याय के रूप में ही लेते हैं.

सरल शब्दावली में अपराध किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी भी कार्य या चूक को संदर्भित करता है जो लागू होने के लिए किसी भी कानून द्वारा निषिद्ध है और जिसे कानून के तहत दंडनीय बना दिया गया है. भारत में अपराध और आपराधिक परीक्षण से निपटने वाले कानून निम्न हैं .

  • भारतीय दंड संहिता, 1860
  • आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973
  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872

भारतीय दंड संहिता को एक संयम कानून के रूप में जाना जाता है, जबकि आपराधिक प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य अधिनियम को प्रक्रियात्मक कानून के रूप में जाना जाता है. सर्वोच्च न्यायालय के वकीलों और यहां तक ​​कि शीर्ष आपराधिक वकील भी आपराधिक मामलों से निपटने के दौरान इन कानूनों पर ध्यान केंद्रित करते हैं.

आपराधिक प्रक्रिया संहिता तीन प्रकारों में क्रिमिनल ट्रायल को वर्गीकृत करती है .

आपराधिक प्रक्रिया संहिता में वर्णित आपराधिक मामलों के प्रकार हैं:

  • वारंट केस
  • सम्मन केस
  • समरी केस

वारंट केस को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (x) के तहत इस प्रकार परिभाषित किया गया है की यह केस मृत्यु के साथ दंडनीय अपराध, या आजीवन कारावास या यह 2 साल से अधिक के कारावास से संबंधित है.

समन केस को आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (डब्ल्यू) के तहत इस प्रकार परिभाषित किया गया है की यह केस अपराध से सम्बंधित है और यह वारंट केस के दायरे में नहीं आता है.

समरी केस को आपराधिक प्रक्रिया संहिता के अध्याय XXI के तहत निपटाया जाता है.

यह  भी कहा जा सकता है की किसी भी अपराधी या अभियुक्त को अदालत द्वारा पहले “समन” भेजा जाता है कि उसे किसी निश्चित तारीख या समय पर अदालत के समक्ष उपस्थित होना है लेकिन यदि वह व्यक्ति कोर्ट के आदेश को अनसुना कर देता है तो फिर उसके खिलाफ “वारंट” जारी किया जाता है जिसके पालन की जिम्मेदारी किसी पुलिस अफसर को दी जाती है और पुलिस अभियुक्त को पकड़ने के लिए उसके घर, दुकान और ऑफिस इत्यादि पर छापे डालती है और यदि जरूरी हुआ तो कुर्की या संपत्ति जब्त जैसे कार्य भी पुलिस द्वारा किये जाते हैं.

आपराधिक कानून के बारे में लोगों को शिक्षित करने के लिए विभिन्न संगठनों द्वारा कई बार मुफ्त कानूनी सलाह अभियान लॉन्च किए जाते हैं.

नीचे दिए गए कुछ चरण हैं जो अपराधिक मामलों में शामिल हैं.

  1. वारंट केस आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के तहत एफआईआरआर के पंजीकरण के साथ शुरू होता है.यह वह महत्वपूर्ण सूचनात्मक दस्तावेज होता है जिसके आधार पर पुलिस कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाती है.
  2. एफ.आई.आर के बाद अगला कदम जांच अधिकारी द्वारा मामले की जांच है जो मामले के तथ्यों की जांच करता है और सबूत इकट्ठा करता है और मजिस्ट्रेट के सामने यह फाइल रखता है जिसमे अपराध दर्ज होता है.
  3. अभियुक्त के पास अदालत के समक्ष अपनी जमानत के लिए अपील करने का विकल्प होता है .
  4. जांच अधिकारी द्वारा पुलिस रिपोर्ट जमा करने के बाद अदालत द्वारा एक फ्रेम तैयार किया जाता है .वारंट मामले के लिए लिखित रूप में आरोपों को फ्रेम करना अनिवार्य है.
  5. आपराधिक प्रक्रिया संहिता धारा 241 के तहत आरोपी को आरोप लगाए गए अपराधों को कुबूलने का  मौका दिया जाता है.
  6. यदि आरोपी गुनाह नहीं कबूलता है तो मुख्य परीक्षा में अभियोजन पक्ष को न्यायालय के समक्ष अपने गवाहों के पक्ष में सबूत पेश करना पड़ता है जो विभिन्न गवाहों के बयान द्वारा समर्थित होते हैं.
  7. गवाहों की बयानों की पुष्टि बार-बार की जाती है.
  8. इसके बाद अभियुक्त को सुनवाई और उसके केस से उसे बचाने का मौका दिया जाता है.
  9. दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद अदालत इस मामले पर फैसला देती है की आरोपी को दोषी ठहराए या नहीं.

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