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भारत देश अपनी धार्मिक भाषाओँ और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है. यह विविधता और भाषाएँ भारत के कानूनों में विविधता लाती हैं. यहाँ हर धर्म के समुदाय के पास तलाक के मुद्दों सहित कई मुद्दों पर अपने-अपने तर्क होते हैं . भारत में विभिन्न मुद्दों पर तर्क देने वाले हर धर्म के पास अपने-अपने कानून हैं. जैसे हिन्दू धर्म के लोगों के लिए हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 बनाया गया है. यह एक्ट हिंदुओं, बौद्धों, सिखों और जैनों पर भी लागू होता है. जबकि मुस्लिम, ईसाई और फारसी धर्म के समुदाय के पाद अपने-अपने कानून हैं.

अन्य लॉ जो की तलाक की कार्यप्रणाली देखते हैं वह हैं स्पेशल मैरिज एक्ट,1956 और फॉरेन मैरिज एक्ट,1969. भारत में कानूनी सलाह लेना कोई आसान काम नहीं है. कई लोग तो ऑनलाइन माध्यम से समाधान निकालने की कोशिश करते हैं. कई लोग ऑनलाइन टटोलते रहते हैं की कोई समाधान मिल जाए. तलाक भी उन्ही मुद्दों में से एक है . तलाक के समबन्ध में आपको अपने अधिकारों को जानना बेहद आवश्यक है. यह कुछ अधिकार हैं जो तलाक को नियंत्रण करने वाले अधिकार हैं .

तलाक को नियंत्रित करने वाले कानूनों में विविधता के बावजूद, भारत में तलाक कानूनों को इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है.

पारस्परिक सहमति से तलाक

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कंटेन्सटेड तलाक

पारस्परिक सहमति से तलाक

यह एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें पति और पत्नी दोनों को पारस्परिक रूप से तलाक के लिए सहमत होना चाहिए.पारस्परिक सहमति से तलाक लेने के लिए दोनों को अलग होना चाहिए और यह साबित करना होगा कि वे एक साथ नहीं रह रहे हैं. पारस्परिक सहमति से तलाक के लिए एक याचिका पारिवारिक न्यायालय में दायर की जाती है, जहां वे एक हलफनामे के रूप में एक साथ रहते थे. हालांकि, उस समय के दौरान कोई भी अदालत के समक्ष आवेदन कर अपनी सहमति वापस ले सकता है और कह सकता है की वह तलाक लेने के लिए तैयार नहीं है या की उसकी इच्छा नहीं है तलाक लेने की या वे आपसी सहमति से तलाक लेने की इच्छा नहीं रखते हैं.

दिल्ली और देश भर में शीर्ष तलाक वकीलों का मानना ​​है कि आपसी सहमति से तलाक विवाह से बच्चों को समय और आघात से बचाने के लिए विवादों के जोड़ों को चुनना चाहिए. यह प्रावधान लंबे कानूनी विवादों को कम करने और तलाक के मामलों का शीघ्र निपटान प्रदान करने के लिए शामिल किया गया है.

कंटेन्सटेड तलाक

यह तब होता है जब कोई व्यक्ति तलाक की पेशकश करता है जब दोनों की आपसी सहमती ना हों. आपसी सहमती ना होने पर इन अधिकारों से कोई भी पति/पत्नी तलाक ले सकता है.

क्रूरता : शारीरिक क्रूरता और मानसिक क्रूरता दोनों की कोई विशिष्ट परिभाषा नहीं है.कोई भी पति -पत्नी क्रूरता के कारण एक-दूसरे से तलाक ले सकता है.

एडलटेरी : यह एक ऐसी स्थिति है जहां एक पति / पत्नी के बीच विवाह के बंधन से परे एक संवेदी यौन संभोग होता है. इस अधिकार पर भी कोई भी पति/पत्नी एक दूसरे से तलाक ले सकता है. हाँ यह ध्यान देने योग्य है कि भारत में कानून केवल एडलटेरी करने के लिए एक आदमी को दंडित करते हैं, एक महिला को कभी भी एडलटेरी के लिए दंडित नहीं किया जाता है. हालांकि पति के पास एडलटेरी के लिए अभियोजन पक्ष एक विकल्प होता है.

परित्याग : इसे भी एक प्रकार का अधिकार माना जा सकता है, जब कोई भी अपने साथी की बुराई करता है.

परिवर्तन : इसमें यह अधिकार होता है की अगर कोई भी पति-पत्नी अन्य धर्म को अपनाते हैं तो दूसरा साथी तलाक ले सकता है.

मानसिक बिमारी : यदि कोई भी पति / पत्नी किसी भी मानसिक बीमारी से पीड़ित है जो अपने साथी के साथ शादी के सामान्य कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो तो दूसरा साथी इस अधिकार पर तलाक ले सकता है.

संक्रमणीय बीमारी: जब कोई भी साथी किसी भी संक्रमणीय बीमारी से पीड़ित होता है तो दूसरा संक्रमणीय बीमारी के आधार पर तलाक ले सकता है.

अगर पति/पत्नी विवाहित जीवन का त्याग करते हैं तो कोई भी पीड़ित पति/पत्नी तलाक ले सकते हैं.

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