cheque

पैसों के लेन-देन की अगर बात करें तो आजकल के दौर में सबसे आम अगर कोई जुर्म है तो वो चेक का बाउंस हो जाना ही है. सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ अदालत में 40 लाख चेक बाउंस के केस पेंडिंग हैं. चेक के बाउंस होने का सबसे बड़ा कारण है अकाउंट में फण्ड का ना होना. हालाँकि चेक बाउंस ना हो तो वो अच्छा ही है, फिर भी अगर ऐसी स्थिति आ जाए तो आपके पास क्या अधिकार हैं ये हम आपको बताते हैं-

चेक बाउंस या चेक का डिस-ऑनर हो जाने का अर्थ?

चेक आदेशक के द्वारा जारी किया जाता है. एक चेक तब बाउंस या डिसऑनर कहलाता है जब ये चेक आदेशक के बैंक में बिना भुगतान किये वापिस भेज दिया जाता है. चेक के भुगतान न होने के कई कारण हो सकते हैं जिसमें फण्ड का न होना, हस्ताक्षर का न मिलना, चेक की अवधि समाप्त हो जाना, ग्राहक की मृत्यु हो जाना, ग्राहक का दिवालिया घोषित हो जाना, चेक पर अधिलेखन या ओवर-राइटिंग, खाता संख्या का ग़लत हो जाना और चेक के असली होने पर शक होना.

चेक बाउंस होने की स्थिति में भारत में क्या है क़ानून?

चेक का बाउंस होना भारत में दण्डनीय अपराध है और ऐसा होने की स्थिति में शिकायत नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट की धारा 138 के अंतर्गत की जा सकती है. इसके अतिरिक्त चेक के अमाउंट ब्याज सहित, उस पर लगी लागत वापिस पाने के लिए दीवानी का दावा भी किया जा सकता है.

मुस्लिम परिवार में शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें 

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के अंतर्गत इसे अपराध माने जाने के लिए किन बातों का होना ज़रूरी है?

धारा 138 के अंतर्गत अपराध माने जाने के लिए निम्नलिखित बातों का होना ज़रूरी है-

1. सबसे पहली बात तो इसमें यही है कि बैंक के किसी ग्राहक द्वारा अपने खाते से किसी अन्य व्यक्ति को निश्चित रक़म का चेक जारी किया जाना चाहिए.
2. चेक किसी ऋण या किसी और दायित्व को चुकाने के लिए जारी किया गया हो.
3. बैंक में चेक को जारी होने की तारीख़ के 6 महीनों के अन्दर या इसकी वैलिडिटी पीरियड के अन्दर प्रस्तुत किया गया है. दोनों में जो तारीख़ पहले हो.
4. चेक बिना भुगतान बैंक द्वारा वापिस किया गया हो. इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे खाते में फ़ण्ड की मात्रा अपर्याप्त होना, हस्ताक्षर का ना मिलान हो पाना या फिर चेक में लिखी गयी राशि उस राशि से ज़्यादा हो जो बैंक से निकाली जा सकती है.
5. चेक के धारक या अदाता(पैसे प्राप्त करने वाला) को बैंक से भुगतान न होने की स्थिति में चेक जारी करता से भुगतान के लिए मांग करनी होगी, इसके लिए चेक धारक को चेक जारीकर्ता के लिए 15 दिन के भीतर लिखित में नोटिस जारी करना होगा. ये 15 दिन तब से मान्य होंगे जिस तारीख़ को बैंक ने चेक वापिस करने या भुगतान नहीं करने की सूचना दी है.
6. यदि इस नोटिस के मिलने के बाद अगर चेक जारीकर्ता 15 दिन के अन्दर चेक धारक को भुगतान नहीं कर पाता है.

कहाँ और कौन दाख़िल कर सकता है चेक बाउंस का मुक़दमा?

चेक बाउंस होने पर मुक़दमा उसी क्षेत्र में हो सकता है जहाँ इस चेक को भुगतान के लिए आपके द्वारा प्रस्तुत किया गया है. आमतौर पर चेक बाउंस का केस चेक का प्राप्तकर्ता ही करता है लेकिन पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी के ज़रिये भी केस को दाख़िल किया जा सकता है.

अगर मेरा चेक बाउंस होता है तो मुझ पर क्या जुर्माना (पेनल्टी) लग सकती है?

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के अंतर्गत अगर चेक बाउंस के मामले में आपको दोषी पाया जाता है तो 2 साल तक की क़ैद या चेक में दी गयी रक़म का दुगना जुर्माना या फिर दोनों हो सकता है. इस मामले में सज़ा इस आधार पर तय होती है कि जुर्म कितना संगीन है. बैंक के पास ये अधिकार हैं कि बार-बार चेक बाउंस होने की सूरत में खाता-धारक की चेकबुक फैसिलिटी ख़त्म कर दे. बैंक चाहे तो वो ऐसे ग्राहक का खाता भी बंद कर सकता है जिसका चेक बार-बार बाउंस हो रहा है.

पोस्ट डेटेड चेक के लिए क्या है क़ानून?

जैसा कि ऊपर हमने ज़िक्र किया है कि बैंक में चेक को 6 महीने के अन्दर प्रस्तुत करना होगा, पोस्ट डेटेड चेक की स्थिति में ये 6 महीने उस तारीख़ से माने जायेंगे जो तारीख़ चेक पर लिखी है.

अगर मुझ पर कोई चेक बाउंस होने का झूठा आरोप लगा दे, तो मैं अपना बचाव कैसे करूँ?

व्यापारिक गतिविधियों में ऐसा भी होता है कि आप किसी को बतौर सिक्यूरिटी चेक दे देते हैं लेकिन चेक की तारीख़ से पहले ही आप पार्टी को भुगतान कर देते हैं. इसके बावजूद जिस व्यक्ति को आपने चेक जारी किया था वो बैंक में चेक को प्रस्तुत कर देता है और ऐसे में चेक बाउंस हो जाता है. चेक बाउंस के झूठे केस से बचने के लिए आपको ये साबित करना होगा कि चेक आपने बतौर सिक्यूरिटी दिया था और अब पार्टी को कोई भी ऋण का पैसा वापिस नहीं किया जाना है क्यूँकि भुगतान हो चुका.

क्या चेक बाउंस का केस कंपनियों और फर्म के ख़िलाफ़ भी दाख़िल किया जा सकता है?

चेक बाउंस का केस कंपनी के निर्देशकों (डायरेक्टर्स) और फर्म के साझेदारों के ख़िलाफ़ किया जा सकता है.

क्या इस बारे में कोई समय सीमा भी है कि कितने दिनों के भीतर ग्राहक शिकायत कर सकता है?

जी, नोटिस पीरियड के ख़त्म होने के 1 महीने के भीतर शिकायत दर्ज करानी होगी. अगर आपसे देरी होती है तो देरी होने का वाजिब कारण देना होगा.

(Lawzgrid – इस लिंक पर जाकर आप ऑनलाइन अधिवक्ता मुहैया कराने वाले एप्लीकेशन मोबाइल में इनस्टॉल कर सकते हैं, कोहराम न्यूज़ के पाठकों के लिए यह सुविधा है की बेहद कम दामों पर आप वकील हायर कर सकते हैं, ना आपको कचहरी जाने की ज़रूरत है ना किसी एजेंट से संपर्क करने की, घर घर बैठे ही अधिवक्ता मुहैया हो जायेगा.)

Loading...