education

नेल्सन मंडेला ने कहा है की “शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं” और यह बात सत्य भी है किसी भी राष्ट्र की साक्षरता दर उस देश के विकास को काफी हद तक दर्शाती है. भारत एक विकासशील देश होने के नाते अंग्रेजों से स्वतंत्रता पाने के तुरंत बाद शिक्षा को अपने नागरिकों के लिए अनिवार्य अधिकार के रूप में गारंटी नहीं देता था लेकिन शिक्षा के संबंध में प्रावधान राज्य नीति के निर्देश सिद्धांतों में शामिल किया गया था.

शिक्षा का अधिकार 

स्वतंत्रता और अन्य सामाजिक गड़बड़ी के समय देश की वित्तीय स्थिति अनिवार्य नहीं होने का कारण था. हालांकि, शिक्षा के लिए सभी को उपलब्ध कराने के लिए कई स्तरों पर कदम उठाए गए हैं. शुरुआत में भारत के संविधान में 86 वें संशोधन द्वारा चिह्नित की गई थी. 86 वें संशोधन ने भारत के संविधान में अनुच्छेद 21 ए को शामिल किया. अनुच्छेद 21 ए ने शिक्षा को एक मौलिक अधिकार दिया है जिसमें कहा गया है कि 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जाएगी. इस संशोधन के बाद 86 वें संशोधन को प्रभावित करने के लिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम तैयार किया गया था. आरटीई अधिनियम मुक्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का समर्थन करता है और प्रोत्साहित करता है.

नि: शुल्क शिक्षा से यह कहा जाता है कि किसी भी बच्चे को किसी भी प्रकार की फीस का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं होती है जिसके माता-पिता के पास अपने बच्चे के शैक्षणिक खर्चों का भुगतान करने की वित्तीय स्थिति नहीं होती है. अनिवार्य शिक्षा के अनुसार, सरकार और संबंधित स्थानीय अधिकारियों को बच्चों को शिक्षा के अधिकार की पूर्ति सुनिश्चित करना है.

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शिक्षा के अधिकार अधिनियम की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • छह से चौदह वर्ष तक के हर बच्चे के लिए नजदीकी विद्यालय में मुफ्त आधारभूत शिक्षा अनिवार्य है.
  • इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए बच्चों से किसी भी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा और न ही उन्हें शुल्क अथवा किसी खर्च की वजह से आधारभूत शिक्षा लेने से रोका जा सकेगा, यदि छह के अधिक उम्र का कोई भी बच्चा किन्हीं कारणों से विद्यालय नहीं जा पाता है तो उसे शिक्षा के लिए उसकी उम्र के अनुसार उचित कक्षा में प्रवेश दिलवाया जाएगा.
  • इस अधिनियम के प्रावधानों को कियान्वित करने के लिए संबंधित सरकार तथा स्थानीय प्रशासन को यदि आवश्यक हुआ तो विद्यालय भी खोलना होगा. अधिनियम के तहत यदि किसी क्षेत्र में विद्यालय नहीं है तो वहां पर तीन वर्षों की तय अवधि में विद्यालय का निर्माण करवाया जाना आवश्यक है.
  • इस अधिनियम के प्रावधानों को अमल में लाने की जिम्मेदारी केंद्र एवं राज्य सरकार, दोनों की है, तथा इसके लिए होने वाल धन खर्च भी इनकी समवर्ती जिम्मेदारी रहेगी.

न्यायिक निर्णय 

मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य {(1992) 3 एससीसी 666}: कैपिटेशन फीस केस

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि शिक्षा का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे में अधिकार के रूप में जीवन के अधिकार से शिक्षा के अधिकार के तहत एक मौलिक अधिकार है. अदालत ने आगे कहा कि शिक्षा के अधिकार के आनंद के बिना जीवन के अधिकार की पूरी तरह से सराहना नहीं की जा सकती है. माननीय न्यायालय ने पाया कि जीवन के अधिकार उन सभी अधिकारों के लिए एक अभिव्यक्तिपूर्ण अभिव्यक्ति है जो न्यायालयों को लागू करना चाहिए क्योंकि वे जीवन के सम्मानित आनंद के लिए मूल हैं. जीवन का अधिकार तब तक आश्वस्त नहीं किया जा सकता जब तक कि शिक्षा के अधिकार के साथ न हो.

सी मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य {(1996) आरडी एससी 1576}:

माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि अनुच्छेद 45 ने उन्नी कृष्ण के मामले के फैसले के बाद मौलिक अधिकार की स्थिति प्राप्त की है. अदालत ने कहा कि यह आवश्यक नहीं है कि मौलिक अधिकार के रूप में व्यवहार करने के अधिकार के लिए इसे संविधान के भाग III में स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए. इसके अलावा, अदालत ने कहा कि भाग III और भाग IV के तहत स्थापित प्रावधान पूरक हैं और खंड III में भाग अधिकारों की तुलना में भाग III के तहत स्थापित अधिकार बेहतर हैं.

अब नियम अच्छी तरह से स्थापित है कि 14 साल की उम्र तक के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए.

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