0980800000000000

इन दिनों लिव इन रिलेशनशिप पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी प्रसिद्द है,  कई लोगों को लगता है की लिव इन रिलेशनशिप बूरा हैं, क्योंकि इससे कपल शादी जैसी जिम्मेदारियों से पीछे हटते हैं तो कई को लगता है की यह सही है. लिव -इन-रिलेशनशिप दो जोड़ों के बीच का एक अनूठा बंधन होता है, जिसमे जोड़े बिना शादी किये ही एक-दूसरे के साथ सालों बिता देते हैं. हालंकि लिव इन में रहने के लिए दोनों के बीच प्यार, भरोसा होना चाहिये.समय-समय पर लागू होने वाले किसी भी कानून के तहत लिव-इन-रिलेशनशिप शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है.

लिव इन रिलेशनशिप को मिली है मंजूरी 

सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे मंजूरी दी थी, सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैध माना था,  इंद्र शर्मा बनाम वी.केवी शर्मा के ऐतिहासिक निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि हर रिश्ते की तरह लिव-इन या विवाह न तो अपराध है और न ही पाप . हाँ यह इस देश में सामाजिक रूप से अस्वीकार्य है. शादी करने का फैसला या ना करने का फैसला बेहद व्यक्तिगत होता है.

शादी की उम्र ना होने पर भी रह सकते हैं लिव इन में 

अब केरल उच्च न्यायालय ने केरल के नंदकुमार बनाम स्टेट ऑफ़ केरला के मामले को देख कर एक निर्णय पारित किया है, जिसमे कहा गया है की कानूनी शादी की उम्र ना होने पर भी कोई भी कपल लिव इन में रह सकता है,  सुप्रीम अदालत ने केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें तुषारा नाम की लड़की की कस्टडी उसके पिता को दी गई थी और कहा गया था की उनकी बेटी अपीलकर्ता की अवैध हिरासत में थी.

मुस्लिम परिवार में शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें 

हालांकि, अपीलकर्ता ने कहा था की “उनकी बेटी और उसके प्रेमी ने शादी कर ली थी और उसके बाद एक साथ रह रहे थे.”

क्या था मामला ?

न्यायालय में यह भी पाया गया था की केरल के युवक नंदकुमार और युवती तुषारा ने पिछले साल अप्रैल में शादी की थी. शादी के समय तुषारा की उम्र 19 साल (विवाह के लिए तय न्यूनतम उम्र 18 साल) थी, लेकिन नंदकुमार की 20 साल (विवाह के लिए न्यूनतम उम्र 21 साल) थी. इस आधार पर केरल हाईकोर्ट ने तुषारा की कस्टडी देने की उसके पिता की याचिका स्वीकार कर ली. इस फैसले के खिलाफ नंदकुमार ने शीर्ष अदालत का रुख किया.

सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया केरल कोर्ट का फैसला 

हालांकि, अपीलकर्ता के पास एक दो फोटो के अलावा साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत भी नहीं थे इसलिए, उच्च न्यायालय ने घोषणा की थी कि थिशारा अपीलकर्ता की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं थी और उसकी कस्टडी उसके पिता को सौंपी थी.

उच्च न्यायालय के फैसले के बाद, सुप्रीम कोर्ट में अपील को प्राथमिकता दी गई थी. माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय में गलती हुई थी क्योंकि थुशारा ने बहुमत की उम्र प्राप्त की थी और इसलिए उनकी हिरासत उनके पिता को भी नहीं दी जा सकती थी. एक प्रमुख होने के नाते उसे यह चुनने का अधिकार था कि वह कहां और किसके साथ रहना चाहती है.

विवाह के संबंध में माननीय न्यायालय ने कहा कि:

 याचिकाकर्ता नंदकुमार के विवाह को शादी के समय 21 साल से कम उम्र होने के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता है. नंदकुमार और उससे विवाह करने वाली लड़की तुषारा हिंदू है. ऐसे में हिंदू विवाह अधिनियम 1995 के तहत ऐसी शादियां अमान्य नहीं हो सकती. जैसा कि अधिनियम की धारा 12 में प्रावधान में है.  “इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि अपीलकर्ता की उम्र 21 वर्ष से कम थी, इसलिए दोनों का विवाह शून्य है.”

न्यायालय ने यह भी कहा कि “भले ही दोनों की उम्र विवाह करने योग्य नहीं है लेकिन उन्हें बिन विवाह के भी रहने का अधिकार है, शादी की उम्र ना होने के अलावा यह पर्याप्त है की याचिकाकर्ता बालिग हैं और बिना शादी के साथ रहने का अधिकार रखता है. पीठ ने कहा, यहां तक कि अब विधायिका में भी लिव इन रिलेशन को मान्यता मिली है. ऐसे संबंध में रह रही महिलाओं को भी घरेलू हिंसा कानून 2005 में संरक्षण दिया गया है.

(Lawzgrid – इस लिंक पर जाकर आप ऑनलाइन अधिवक्ता मुहैया कराने वाले एप्लीकेशन मोबाइल में इनस्टॉल कर सकते हैं, कोहराम न्यूज़ के पाठकों के लिए यह सुविधा है की बेहद कम दामों पर आप वकील हायर कर सकते हैं, ना आपको कचहरी जाने की ज़रूरत है ना किसी एजेंट से संपर्क करने की, घर घर बैठे ही अधिवक्ता मुहैया हो जायेगा.)