live in relationship 1

लिव इन रिलेशनशिप पर विचार करने वाले समाज में कई प्रकार के लोग पाए जाते हैं. कुछ लोग इसका जमकर समर्थन करते हैं तो वहीं कुछ लोग इस पर आपत्ति जताते हैं. भारत में युवा इसका समर्थन करते हैं तो वहीं कुछ लोग इस पश्चिमी कांसेप्ट पर आपत्ति जताते हैं. भारत में अनेकों संस्कृतियाँ देखने को मिलती हैं जिस वजह से भारत में अभी भी लोग रीति-रिवाजों का पालन करते हैं. लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल्स के बचाव में सुप्रीम कोर्ट आया है,सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले कपल्स के बचाव में सुनाया है.जानिये क्या कहा है सुप्रीम कोर्ट ने ?

क्या है लिव इन रिलेशनशिप ?

लिव -इन-रिलेशनशिप दो जोड़ों के बीच का एक अनूठा बंधन होता है, जिसमे जोड़े बिना शादी किये ही एक-दूसरे के साथ सालों बिता देते हैं. हालंकि लिव इन में रहने के लिए दोनों के बीच प्यार, भरोसा होना चाहिये.समय-समय पर लागू होने वाले किसी भी कानून के तहत लिव-इन-रिलेशनशिप शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है.

बूरा नहीं है लिव इन में रहना 

दिल्ली और देश भर के शीर्ष वकील भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति के लिए लिव -इन-रिलेशनशिप को सही बताते हैं. विवाहित होने के बिना लिव-इन-रिलेशनशिप में एक जोड़े का रहना बूरा नहीं माना जाता है.

कहा जाता है कि यह लिव इन रिलेशनशिप की अवधारणा को विभिन्न पश्चिमी देशों से भारत में लाया गया है, जिसे किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत निर्णय माना जाता है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित व्यक्ति के जीवन के अधिकार के तहत यह सही गारंटी है.

हुई थी लिव इन पर काफी बहस 

लिव -इन रिलेशनशिप को पहली बार ए दीनोहामी वी डब्ल्यूएल ब्लहामी में प्रिवी काउंसिल द्वारा वैध बनाया गया था, जिसमें कहा गया था कि जब एक आदमी और एक महिला पति और पत्नी के रूप में साथ रहते हैं तो उसे कानून माना जाएगा, जब तक कि इसके विपरीत स्पष्ट रूप से साबित न हो, कि वे एक वैध विवाह के परिणामस्वरूप एक साथ रह रहे थे, न कि संविधान की स्थिति में. हालांकि इसके बाद के निर्णयों में, अदालतों द्वारा विपरीत अवलोकन किए गए थे.

गोकुल चंद और प्रवीण कुमारी में, यह माना गया था कि लंबे समय तक एक साथ रहना वैधता की गारंटी नहीं देता है.
इस फैसले ने गैर-रिश्तों को गैरकानूनी नहीं बनाया लेकिन उन्होंने कहा है कि यह वैध रिश्ते की स्थिति भी प्राप्त नहीं करेगा.

इंद्र शर्मा बनाम वी.केवी शर्मा के ऐतिहासिक निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि हर रिश्ते की तरह लिव-इन या विवाह न तो अपराध है और न ही पाप . हाँ यह इस देश में सामाजिक रूप से अस्वीकार्य है. शादी करने का फैसला या ना करने का फैसला बेहद व्यक्तिगत होता है.

लिव इन में रहने वाले जोड़ों का बच्चा भी होगा वैध 

एसपीएस के ऐतिहासिक फैसले में माननीय सर्वोच्च बलसुब्रमण्यम बनाम सुरुथाया ने लिव इन रिलेशन को स्वीकार किया है और कहा है कि “जब एक आदमी और एक महिला लंबे समय तक एक ही छत के नीचे रहती है तो यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत माना जाता है कि वे विवाहित हैं और हाँ अगर उनका कोई बच्चा होगा तो उसे भी वैध माना जाएगा.”

अदालतों ने महिलाओं के लिए कहा है की “घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने वाले कानून के प्रावधान लिव-इन-रिलेशन में रहने वाले जोड़ों के लिए भी सामान रूप से लागू होंगे.”

कानून और समाज 

दिल्ली और देश भर के शीर्ष वकील कहते हैं कि कानून ने कभी भी किसी व्यक्ति की पर्सनल लाइफ में तांक-झाँक नहीं की है हाँ अगर लिव इन में रहने वाले जोड़ों के बीच अगर कोई बाधा आई है तो वह सिर्फ समाज है. जबकि कानून ने लिव इन को समर्थन देकर आगे बढ़ने की अवधारणा को स्वीकार कर लिया गया है, फिर भी कुछ लोग इस अवधारणा का विरोध करते हैं और इसे धार्मिक नीतियों के प्रति अनैतिक और विरोध मानते हैं.

हालांकि आज तक लिव -इन-रिश्तों से निपटने के लिए कोई कानून तैयार नहीं किया गया है. लेकिन अब यह माना जाता है कि इस तरह के रिश्ते में हिंसा के खिलाफ महिलाओं को ऐसे रिश्ते और सुरक्षा के संबंध में विशिष्ट प्रावधान किए जाने चाहिए. लोगों का मानना ​​है कि कानून की कमी से जोड़ों के अधिकारों का उल्लंघन होता है और इस तरह के जोड़ों के खिलाफ लोगों को भेदभाव करने का भी मार्ग प्रशस्त होता है.

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