loan

अगर हम विजय माल्या या नीरव मोदी जैसे केस को देखें तो ऐसा लगता है कि ऋण लेकर बिना किसी डर के भी रहा जा सकता है और बहुत आसानी से ख़ूब सारा पैसा लेकर विदेश जाया जा सकता है. परन्तु ये बात आम इंसान पर लागू नहीं होती.
इसीलिए जब भी हम किसी ऋण की किश्त चुकाने से रह जाते हैं चाहे वो होम-लोन हो, या ऑटो लोन या फिर कोई और छोटा ही लोन, हमारे दिमाग़ में ये सवाल आ जाता है कि क्या ऋण वापस करने में चूक जाने पर मुझे जेल भेजा जाएगा.

साफ़ तौर पर तो इसका सीधा जवाब है कि शायद नहीं लेकिन इसके बारे में कई सारे और कारकों को समझने की ज़रुरत है-

क़र्ज़ ना चुका पाना भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के अंतर्गत अपराध मानी जाती है. अगर आप ऋण चुकाने से इनकार कर देते हैं तो आप जानबूझकर ऋण ना चुकाने वाले माने जाते हैं,इसको लेकर बैंक धोखाधड़ी का मुक़दमा दर्ज कर सकता है.

अगर मुक़दमा दर्ज हो जाता है और अदालत में भी आप दोषी सिद्ध हो जाते हैं तो आपको 7 साल तक की सज़ा हो सकती है.

लेकिन ये आम चलन में नहीं है. सही तो ये है कि बैंक पैसों की रिकवरी के लिए अदालत का दरवाज़ा नहीं खटखटाते क्यूंकि ऐसा होने पर उन्हें कुछ अतिरिक्त शुल्क उठाना पड़ता है जो बैंक के लिए भी एक बोझ हो जाता है.

ऐसे में आप क्या सोचते हैं कि ऋण ना वापिस मिलने की स्थिति में बैंक क्या करेगा?

ऋण पुनर्निर्धारण (Debt Rescheduling):    बैंक आपकी EMI को घटा सकता है और आपके ऋण को चुकाने के लिए ली गयी अवधि को भी बढ़ा सकता है और आपको कम EMI पर ऋण को ज़्यादा वर्षों तक चुकाने के लिए कह सकता है.

भुगतान को टाल देना (Deferring the Payment):   यदि कोई ऐसी मुसीबत ऋण लेने वाले के पास आ जाती है कि किश्त चुकाना अभी संभव नहीं है जैसे नौकरी का छूट जाना, कोई हादसा हो जाना, इत्यादि. ऐसे में बैंक कुछ समय की मोहलत दे देता है.

ऋण पुनर्गठन(Loan Restructuring):   ये सुविधा अधिकतर होम-लोन में होती है, बैंक इसमें लोन की वापसी के लिए एक साल तक की अवधि बढ़ा सकता है.

ऋण रूपांतरण (Loan Conversion):   बैंक आपको ये विकल्प देता है कि आप अपने ग़ैर-ज़मानती ऋण (unsecured loan) को ज़मानती ऋण (secured loan) में बदल लें जिससे कि आपकी EMI काफ़ी कम हो सकती है.

एक मुश्त निपटान (One Time Settlement):   कभी-कभी ऐसा होता है कि हर महीने किश्त देना मुश्किल हो जाता है, ऐसे में आप बैंक से एकमुश्त निपटान की बात कर सकते हैं जिसके तहत लगभग रक़म लेकर आपके लोन को सेटल कर दिया जाएगा. हालाँकि ये बात ध्यान देने वाली है कि ऐसा तब आसानी से हो जाता है जब आपके सम्बन्ध बैंक क्रमचारियों से अच्छे हैं.

अगर आप बैंक का क़र्ज़ वापस करने में पूरी तरह से असमर्थ हैं, तो बैंक ये क़दम उठा सकता है-

प्रतिभूतीकरण और वित्तीय आस्तियों का पुनर्गठन और प्रतिभूति हित को प्रभावी करने का अधिनियम 2002 (सरफेसी) के अंतर्गत बैंक आपके ख़िलाफ़ कार्यवाही शुरू कर सकता है. अगर आपके अकाउंट को नॉन-परफोर्मिंग एसेट(90 दिन तक भुगतान ना करना) माना गया है तो बैंक सबसे पहले 60-दिन का नोटिस जारी करेगा.

अगर इस अवधि में आप ऋण चुकाने में नाकाम रहते हैं तो बैंक के पास ये अधिकार होंगे कि वो आपकी संपत्ति की बिक्री-प्रक्रिया शुरू करे.

संपती की बिक्री प्रक्रिया के लिए बैंक को एक 30 दिन का पब्लिक नोटिस जारी करना होगा जिसमें संपत्ति का पूरा ब्योरा होगा.

बैंक नोटिस के ज़रिये प्रॉपर्टी का उचित मूल्य बतायेगा.

ज़ब्त करने के नोटिस और प्रॉपर्टी के उचित मूल्य के नोटिस को लेकर आप अपनी आपत्ति दर्ज करा सकते हैं जिसको लेकर बैंक 7 दिन के भीतर आपको जवाब देगा. इसके बाद ही बैंक के पास प्रॉपर्टी को बेचने का अधिकार प्राप्त होगा (बैंक सिर्फ़ वो प्रॉपर्टी ही बेच सकता है जो सिक्यूरिटी के बतौर ऋण लेते वक़्त दिखायी गयी है)

अगर आप ऋण चुकाने में नाकाम रहते हैं तो ज़ाहिर है कि बैंक आपसे बहुत अच्छी तरह से बात नहीं करेगा लेकिन इसका ये अर्थ नहीं है कि बैंक लोन की रिकवरी के लिए गुंडों का सहारा लेगा या आप पर कोई ग़ैर-क़ानूनी दबाव बनाएगा. इस बारे में रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने साफ़ निर्देश दे रखे हैं.

लेकिन हमें अधिक ज़िम्मेदार होने की ज़रुरत है और ऐसी अवस्था में ख़ुद को ना लाने की ज़रुरत है कि जेल का डर हमें सताने लगे.

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